क्वारंटाइन में शिक्षक-शिक्षिकाओं की एक अहम भूमिका

जिस प्रकार कोरोना वायरस के इस कठिन परिस्थिति में डॉक्टर्स , पुलिस एवं अन्य सहयोगीगण अपना भरपूर योगदान दे रहे है ठीक उसी तरह शिक्षक-शिक्षिकाएं भी अपनी अहम भूमिका निभा रहे है। वो कहते है न - मंजिल उन्ही को मिलती है जो रस्ते की कठिनाईयों की परवाह किये बिना चलते रहते है ठीक उसी तरह शिक्षक-शिक्षिकाएं भी कोरना वायरस के कारण विद्यालय भवनों के कुछ दिनों के लिए बंद होने के पक्ष्चात भी इन्टरनेट के माध्यम से बच्चों को  पढ़ा रहे है। क्वारंटाइन के इस समय में शिक्षक-शिक्षिकाओं ने उनके पढ़ाने के तरीकों में भी बदलाव किये है। पढ़ाई को मजेदार बनाने के लिए उन्होंने अनेकों तरह के क्रियाकलापों का बच्चों को अभ्यास करा रहे है। जिनसे बच्चे बोर भी न हो और उन्हें जो पढाया जा रहा है वो आसानी से समझ सके। 

शिक्षक-शिक्षिकाओं की एक ख़ास बात यह रहती है कि वे अपने विद्यार्थियों से बहुत प्यार एवं देखभाल करते है। यहाँ तक की अगर किसी बच्चे को पढाई में कुछ समझ न आये तो वे उसे बार बार प्रयास करा कर एवं नयी-नयी विधियों से उस बच्चे को चीजें समझा देते हैं। इसके साथ ही साथ वे उन बच्चों को नैतिक शिक्षाओं से भी अवगत कराते हैं। जो वाकई में काफी सराहनीय है। 

वेसे तो क्वारंटाइन में बच्चों को घर बैठ कर पढ़ाना शिक्षक-शिक्षिकाओं के लिए काफी चुनौती पूर्ण कार्य है। ख़ास कर छोटे बच्चों के लिए। जिन्हें हाथ पकड़ कर या उनके सामने रह कर सीखाना पड़ता है। इसके बावजूद भी शिक्षक-शिक्षिकाएं अपना अथक प्रयास कर रहे है। जो सफल साबित हो रही है। 

इसके साथ ही साथ इस क्वारंटाइन में अभिभावकों की भूमिका भी अहम है वे भी अपने बच्चों को घर पर पढ़ा रहे है और अपना भरपूर योगदान दे रहे है। 
मलाला युसूफजई कहती है - "एक किताब, एक कलम, एक बच्चा, एक शिक्षक पुरे विश्व को बदल सकता है।  

अंत में मैं सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं को उनके योगदानों एवं प्रयासों के लिए उनका आभार व्यक्त करता हूँ। एवं आज के विषय का समापन करता हूँ। 

धन्यवाद!

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