सन्त सेसिलिया

रोम के शहीदों में सन्त सेसिलिया का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। उनका जन्म रोम नगर के एक कुलीन परिवार में दूसरी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हुआ। सन्त सेसिलिया के माता पिता कुलीन होते हुए भी उत्तम ख्रीस्तीय थे और उन्होंने अपनी प्यारी पुत्री को ख्रीस्तीय धर्म की शिक्षा दी। प्रभु येसु का मानव-मात्र के प्रति असीम प्रेम तथा मानव-मुक्ति के लिए उनके दुःख-भोग का सेसिलिया के जीवन पर बहुत गहरा असर पड़ा। वह प्रभु येसु के विश्वास में सुदृढ़ होती गयी और उन्हें सारे हृदय से प्यार करने लगी। साथ ही उसने प्रभु के प्यार से तपस्यामय जीवन बिताना और दिन-दुःखियों की प्रेमपूर्ण सेवा करना प्रारम्भ किया। बचपन से ही उसे संगीत में बड़ी रूचि थी और उसके मधुर गानों से सभी लोग प्रभावित होते थे।
युवावस्था की देहलीज़ पर कदम रखते ही सेसिलिया ने यह प्रतिज्ञा की कि वह प्रभु येसु के प्रेम से आजीवन कुँवारी रहेगी और उनकी सेवा करेगी। किन्तु उसके माता-पिता का विचार कुछ और ही था। उन्होंने यथा समय वलेरियन नामक एक कुलीन युवक से उसका विवाह तय कर दिया। किन्तु वलेरियन ख्रीस्तीय विश्वासी नहीं थे। विवाह के दिन संध्या को जब घर में विवाह-भोज चल रहा था और सब अतिथिगण संगीत व नृत्य की लहरियों में मग्न थे, तब सेसिलिया ने अपने कमरे के एकांत में बैठे हुए अपने कौमार्य को प्रभुवर के हाथों में समर्पित किया और उनसे याचना की- "प्रभु, आप ही मेरे स्वामी हैं, मेरा सर्वस्व हैं। अपने कौमार्य की रक्षा करने में आप मेरी सहायता करें।"
सब अतिथियों को विदा करके जब युवक वलेरियन बड़ी उमंग से सेलिसिया से मिलने आया, तब वह बड़े शांत भाव से कड़ी हो गयी। उसने साहस बटोर कर बड़े स्नेहपूर्वक वलेरियन से कहा- "सुनिए, मैं आपको जीवन का एक रहस्य बताती हूँ। ईश्वर का दूत सदा मेरे साथ रहता और मेरी रक्षा करता है। यदि आप मुझे अपनी दुल्हन के रूप में छुएंगे, तो आपको भरी कष्ट भोगना पड़ेगा। किन्तु यदि आप मेरे कौमार्य की रक्षा करेंगे तो वह दूत आपको वैसा ही प्यार करेगा। जैसा वह मुझे प्यार करता है और हर खतरे से आपकी रक्षा करेगा।" वलेरियन ने उत्तर दिया -"कृपया आप उस दूत को मुझे दिखा दें। यदि वह ईश्वर की ओर से होगा, तो मैं आपकी इच्छा के अनुसार कार्य करूँगा।" सेसिलिया ने दृढ विश्वास के साथ कहा- "यदि आप एक ही जीवित ईश्वर में विश्वास करेंगे और उनके नाम में बपतिस्मा ग्रहण करेंगे तो उस दूत को देख सकेंगे। वलेरियन राजी हो गया। सेसिलिया ने उसे रूम के धर्माध्यक्ष उर्बानुस के पास भेज दिया। धर्माध्यक्ष ने वलेरियन का स्वागत किया उसे ख्रीस्तीय शिक्षा प्रदान की जिसे स्वीकार कर उसने प्रभु येसु में विश्वास किया। तब उसने धर्माध्यक्ष से बपतिस्मा ग्रहण किया और यह शुभ-समाचार लेकर लौट आया। जब वह सेसिलिया के कमरे के पास पहुंचा, तब यह देखकर उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि एक स्वर्गदूत सेसिलिया के एक ओर खड़ा है। दूत उसे देखकर प्रसन्न हो गया और उसके पास आकर गुलाबों तथा सोसनों का एक-एक मुकुट उनके सर पर रख दिया। वलेरियन पूर्णतया बदल गया और वह सेसिलिया का सम्मान करने और शुद्ध हृदय से उसे प्रेम करने लगा। यह देखकर कुछ ही दिनों में वलेरियन के भाई तिबुर्सियुस का भी मन परिवर्तन हो गया और उसने भी धर्माध्यक्ष उर्बानुस से बपतिस्मा ग्रहण किया।

उन दिनों सम्राट मार्कुस औरेलियस रोम का शासक था जो ख्रीस्तीयों का कट्टर विरोधी था। रोम का राजयपाल भी उसी के सामान दुष्ट और ख्रीस्त-विरोधी था। अतः राजयपाल ने दोनों भाइयों को पकड़वा कर कैद में डाल दिया। जब देखा कि वे अपने विश्वास में अडिग हैं, तब उसने दोनों की हत्या करवा दी। सेसिलिया उन दोनों शहीदों के शवों को सम्मानपूर्वक दफना कर लौटी ही थी, कि राजयपाल उसकी ओर मुदा। उसने अनेक लोगों को उसके पास भेजा ताकि वह रोमी देवी-देवताओं की पूजा करने के लिए सेसिलिया को समझाए। किन्तु परिणाम उल्टा ही हुआ। जितने भी लोग उसके पास गए, वे सब रोमी देवी-देवताओं को छोड़ ख्रीस्त के विश्वासी बन गए और उन्होंने बपतिस्मा लेना चाहा। धर्माध्यक्ष उर्बानुस सेसिलिया के घर आये और वहाँ उन्होंने चार सौ लोगों को बपतिस्मा दिया। गोर्दन नामक एक अधिकारी का भी मन परिवर्तन हो गया और उसके बाद में सेसिलिया के घर को शानदार गिरजाघर में बदल दिया।
तब राजयपाल बहुत क्रुद्ध हुआ। उसने सेसिलिया को पकड़वा लिया और तीन दिनों तक खौलते हुए पानी में खड़े रखा। उसके बाद जब उसे बाहर निकला गया, तो वह पूर्ण रूप से स्वस्थ एवं प्रसन्न थी। सभी देखने वाले आश्चर्य चकित थे और अनेकों ने प्रभु ख्रीस्त में विश्वास किया। इस पर जल्लाद को बुलवाया गया। जल्लाद ने उसकी गर्दन पर टीम जबर्दस्त वार किये और उसे मृत समझकर छोड़ कर चला गया। किन्तु वीरांगना सेसिलिया मरी नहीं थी। वह तीन दिनों तक अवर्णनीय पीड़ा सहती हुई अपने प्रभु की महिमा जाती रही। अंत में स्वयं को प्रभु को प्रभु के हाथों में सौंपती हुई स्वर्गराज्य की अनन्त महिमा में पहुँच गयी। पाँचवी सदी में सन्त सेसिलिया की कब्र पर महागिरजाघर का निर्माण किया गया। सन्त सेसिलिया संगीतकारों की मध्यस्था मानी जाती है।
माता कलीसिया सन्त सेसिलिया का पर्व 22 नवम्बर को मनाती है।

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