सन्त फिदेलिस

कलीसिया के इतिहास में हम ऐसे अनेक वीर स्त्री - पुरुषों को पाते हैं जिन्होंने प्रभु येसु में अपने विश्वास की खातिर अनेक पीड़ाएँ सही और अन्त में अपनी जान तक भी कुर्बान कर दी। सन्त फिदेलिस ऐसे ही एक महान शहीद हैं । 
उनका जन्म जर्मनी के सिगमरिगेन नामक नगर में सन् 1578 में हुआ । उनके बचपन का नाम मार्क था । उनके पिता नगर के मेयर थे । अपने विवेकी पिता के आदर्श पर मार्क ने भी कानून का अध्ययन किया और कुछ वर्षों तक अदालत में अधिवक्ता के पद पर कार्य किया । इस कार्य में उनकी ईमानदारी , कर्त्तव्य - निष्ठा एवं गरीबों के प्रति प्रेम से सभी अत्यन्त प्रभावित हुए। अतः लोग उन्हें गरीबों के अधिवक्ता के नाम से पुकाराने लगे। किन्तु उन दिनों में भी अदालतों में इतना भ्रष्टाचार चलता था कि 34 वर्ष की आयु में उन्होंने वकालत का कार्य छोड़ दिया । तब अपनी सारी सम्पत्ति बेच कर गरीबों को बाँट दिया और कापुचिन धर्मसंघ में भरती हो गये। वहाँ उन्होंने फिदेलिस नाम लिया और प्रार्थना , प्रायश्चित एवं तपस्या का जीवन बिताने लगे । प्रवचन देने में उनकी खूबी से सभी परिचित थे । अतः अपने अधिकारियों के आदेशानुसार वे लोगों को , विशेष रूप से जो धर्मत्यागी कैल्विन के अनुयायी बन कर ख्रीस्तीय विश्वास से भटक गये थे , अपने प्रवचन तथा प्रार्थना के द्वारा कलीसिया में लौटा लाने का कार्य करने लगे । 
सन् 1621 में उनके अधिकारियों ने उन्हें स्विटजरलैण्ड में सिंगाली लोगों के बीच सुसमाचार प्रचार के लिए भेजा जिसे उन्होंने बड़ी सफलतापूर्वक निभाया । आल्पस के पहाड़ी प्रदेश में दूर - दूर तक बिना किसी साधन के , केवल ईश्वर पिता के परिपालन में निर्भर रहते हुए उन्होंने यात्राएँ की और उन सभी लोगों को सुसमाचार का सन्देश दिया । अपना क्रूस , बाइबिल तथा प्रार्थना पुस्तक ही उनके साथी थे । वे गिरजाघरों में अथवा खुले मैदानों में लोगों को शिक्षा दिया करते थे और हजारों लोग मन परिवर्तन कर काथलिक कलीसिया के सदस्य बने । उनकी इस सफलता को देख कर प्रोटेस्टेंट पादरीगण उनके प्रति ईर्ष्या और क्रोध से जल उठे । उन्होंने फिदेलिस पर अनेकों झूठे आरोप लगाये । एक दिन जब वे किसी गिरजाघर में प्रवचन दे रहे थे , तब उन क्रोधित लोगों ने फिदेलिस को पकड़ लिया और घसीट कर बाहर ले गये और काथलिक विश्वास त्यागने के लिए उन्हें विवश किया । जब फिदेलिस ने उनकी बात नहीं मानी , तब उन दुष्ट लोगों ने उन्हें तरह - तरह की यातनाएँ दी और अन्त में 24 अप्रैल 1622 को छूरा भोंक कर उन्हें मार डाला । इस प्रकार फिदेलिस अपने नाम के अनुरूप प्रभु के प्रेम और विश्वास में अडिग रहते हुए शहीद बने । सन् 1746 में सन्त पिता बेनेदिक्त 14 वें ने उन्हें सन्त घोषित किया । सन्त फिदेलिस कापुचिन समाज का सर्वप्रथम शहीद है । धार्मिक सतावट की परिस्थितियों में वे हमारे उत्तम आदर्श हैं । उनका पर्व 24 अप्रैल को मनाया जाता है ।

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