लाजरुस देवसहायम: 'नई शुरुआत के लिए एक संत'

18वीं शताब्दी में तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के एक हिंदू परिवार में जन्मे लाजर देवसहायम, जिसने ख्रीस्तीय धर्म को स्वीकार किया था और अपने विश्वास के लिए उसे प्राणों की आहूति देनी पड़ी। वे 15 मई 2022 को संत घोषित होने वाले पहले भारतीय लोकधर्मी हैं।
1745 में 'लाजरुस' नाम लेने वाले देवसहायम को ख्रीस्तीय धर्म अपनाने के बाद "बढ़ती कठिनाइयों को सहन करने" के लिए लोकधर्मी को पहली बार फरवरी 2020 में संत की उपाधि के लिए मंजूरी दी गई थी।
देवसहायम की संत प्रक्रिया के पोस्टुलेटर फादर जोसेफ एलफिंस्टन ने वाटिकन रेडियो को बताया कि देवसहायम आज भारत के लिए एक मार्मिक रूप से महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, क्योंकि वे धर्म या सामाजिक प्रतिष्ठा की परवाह किए बिना सभी व्यक्तियों की भाईचारे और सम्मान की मान्यता के एक मॉडल बन गये हैं।
फादर जोसेफ ने समझाया कि एक उच्च जाति के हिंदू परिवार में पैदा हुए देवसहायम ने ख्रीस्तीय धर्म को अपनाया और कठोर जातिगत मतभेदों के बावजूद सभी लोगों की समानता का प्रचार करते हुए भारत की सबसे निचली जातियों के अधिकारों का समर्थन किया। लेकिन सबसे पहले, उन्होंने इस बात पर जोर दिया, कि यह संत घोषणा लोकधर्मियों के लिए एक उच्च सम्मान है जो कलीसिया और लोगों के जीवन में तेजी से शामिल हो रहे हैं।
फादर एलफिंस्टन ने कहा कि यह भारत में काथलिक कलीसिया के लिए एक महत्वपूर्ण समय है, "एक जीवंत कलीसिया जो बढ़ रही है, लोक धर्मी जो कलीसिया के विभिन्न गतिविधियों में अधिक से अधिक शामिल हो रहे हैं और वास्तव में, " कलीसिया की सेवा करने की कोशिश कर रहे हैं।"
इसलिए, एक लोक धर्मी को "सम्मानित किया जाना और सर्वोच्च पद तक पहुँचाना सबसे अच्छा और सर्वोच्च सम्मान है जो हम लोक धर्मी को दे सकते हैं," उन्होंने कहा।
तथ्य यह है कि देवसहायम महान काम करने में सक्षम थे। कलीसिया, समुदाय और लोगों के लिए किया गया उनका योगदान आज भारतीयों के बीच फैलता जा रहा है और हजारों लोग इस संत की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
ये वो संत हैं जो लोगों, "उनकी समस्याओं, उनकी चिंताओं, उनके मतभेदों, उनकी संस्कृतियों" के बारे में चिंता करते हैं।
लाजरुस देवसहायम ने अधिकारों, समानता के क्षेत्र में भी एक महान विरासत छोड़ी है, क्योंकि वह - एक हिंदू उच्च वर्ग का व्यक्ति जिसने जातिगत मतभेदों के बावजूद समानता का प्रचार किया - हाशिए के करीब था क्योंकि उसने मसीह के सुसमाचार का पालन किया था।
फादर जोसेफ ने समझाया कि "कई लोग सोच सकते हैं कि वह केवल धर्मांतरण के कारण मारा गया, शहीद हो गया," लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि त्रावणकोर के राज्य में जहां उन्होंने सेवा की और ख्रीस्तीय धर्म को अपनाया, "राजा ने स्वयं उसके लिए एक छोटा गिरजाघर बनवाया और वहाँ एक पुरोहित को नियुक्त किया और उसके लिए वेतन दिया करता था।"  उसने कार्मेलाइट मिशनरियों के साथ काम किया जो वहां काम कर रहे थे।
फादर जोसेफ ने कहा कि "लोग यह बर्दाश्त नहीं कर पाये कि एक उच्च जाति का व्यक्ति ख्रीस्तीय बनने के बाद उसमें कोई भेद-भाव की भावना नहीं थी" और उन्होंने ईश्वर के वचन का पालन किया कि ईश्वर के सभी बच्चे समान हैं। उनके लिए,कोई उच्च और निम्न, कोई अमीर और गरीब, कोई वर्ग जाति नहीं थी।"
उन्होंने कहा कि उस जमाने में ख्रीस्तियों को एक निम्न और तुच्छ समुदाय माना जाता था और जब यह संत "स्वतंत्र रूप से उनके साथ घूमते, उनके साथ प्रार्थना करते, उनके साथ समारोह मनाते, उनके साथ भोजन करने लगे, तो महल में उच्च जाति के लोग इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते थे।"
"उनका जीवन कुछ ऐसा बन गया जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने इस संत को मार डाला।"
फादर जोसेफ ने कहा, "रोम में लाजरुस देवसहायम का संत घोषणा समारोह न केवल तमिल लोगों के लिए, न केवल भारत में काथलिकों के लिए, बल्कि सभी के लिए गर्व का क्षण है, जैसा कि इस तथ्य से देखा जा सकता है कि सरकार ने समारोह में शरीक होने के लिए तीन मंत्रियों को रोम भेजा है।
उन्होंने कहा कि भारतीयों ने इस पल का 270 साल इंतजार किया है और वे खुशी के साथ समारोह मना रहे हैं। वास्तव में, यह महत्वपूर्ण है कि धर्मांतरण आयाम के कारण, विभाजन को बढ़ावा देने वाले लोगों द्वारा यंत्रीकृत किया जा सकता था, लेकिन खुशी की बात है कि ईश्वर की कृपा से, हम एक शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में हैं और हम एक खुशहाल उत्सव मना रहे हैं।"
"हम नहीं चाहते कि शांति और एकता के लिए काम करने वाले ये संत विभाजन, ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता का प्रतीक बन जाए।" फादर जोसेफ ने कहा कि भारतीय कलीसिया का दृष्टिकोण और ध्यान धर्मांतरण पर नहीं है, बल्कि उन अच्छे मूल्यों पर है, जिन्हें संत लाजरुस देवसहायम ने जीया और अभिव्यक्ति दी।

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