कोहरा, वर्षा और हिम

evaporation

हम जानते हैं कि जब आर्द्र हवा ऊपर उठकर ठंडी होती है तब जलवाष्प संघनित होकर जल की सूक्ष्म बुँदे बनाती हैं | कभी-कभी अनुकूल परिस्थितियों में हवा के बिना ऊपर उठे ही जलवाष्प जल की नन्ही बूंदों में बदल जाती है तब हम इसे कोहरा कहते हैं |

अधिक ऊँचाई पर यानी पहाड़ी क्षेत्रो में कोहरा छाना सामान्य घटना है | ऐसे क्षेत्रों में कोहरें का बनना भूमि सतह पर बनने वाले बदलो से अलग नही होता है क्योकि आर्द्र हवा पहाड़ी ढलान पर ऊपर की ओर उठकर ठंडी और संघनित होती है | मैदानी भागों में कोहरा अधिकतर सर्दियों के दिनों में तापमान के ओसांक सेकम होने पर बनता है | ओसांक वह तापमान है जिस पर हवा आगे और ठंडी होने पर अतिरिक्त नमी या बिना दाब में परिवर्तन के संतृप्त हो जाती है |

मौसम वैज्ञानिकों ने कोहरे को निम्र चार प्रकरों में वर्गिकृत किया है: विकिरण कोहरा, अभिवहन कोहरा, पहाड़ी कोहरा और तटीय कोहरा | कोहरे के ये चारों प्रकार सड़क यातायात, वायु यातायात समुद्री यातायात में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं | सन 1912 में घटित ‘टाइटैनिक दुर्घटना’ कोहरे का ही दुष्परिणाम थी |

स्वच्छ शांत रात के समय भूमि की ऊष्मा विकिरण द्वारा मुक्त होकर,ठंडी होने पर विकिरण कोहरे का निर्माण करती है | इस प्रकार भूमि के समीप की हवा संतृप्त बिंदु तक ठंडी होकर कोहरे का निर्माण करती है | अक्सर कोहरा भूमि के समीप ही सीमित होता है किन्तु कभी-कभी कोहरा अधिक घना और रात भर छाया रहता है | सुबह होने के बाद सौर विकिरण कोहरे को छितरा कर धरती तक पहुँचती है जिससे कोहरा छटने लगता है | भूमि के गर्म होने पर इसके पास वाली वायुमंडल कि पर्त भी गर्म हो जाती है | जिसके कारण हवा का तापमान इतना हो जाता है कि कोहरे की सूक्ष्म जल बूंदें वाष्पित होकर दृश्यता में वृद्धि करती है |

अभिवहन कोहरा उस समय उत्पन्न होता है जब आर्द्र हवा ठंडी सतह के ऊपर बहती है | इस प्रकार की घटना उत्तरी अक्षांशों में वसंत ऋतु के आरंभिक दिनों में जब ठंडी दक्षिण-पश्चिमी हवाएं बर्फीली सतह के ऊपर से गुजरती है तब घटित होती है | इससे हवा की निचली पर्त जल्दी से ठंडी होकर कोहरे के बनने के लिए आवश्यक तापमान तक ठंडी हो जाती है |

पहाड़ी कोहरे के नाम से ही स्पष्ट है कि यह कोहरा तब बनता है जब नम आर्द्र हवा पहाड़ो कि श्रृंखला पर चढती है | पहाड़ों की ओर चलने वाली पवनो की दिशा में हवा ठंडी होती है | यदि हवा संतृप्त हो जाती है तब बादल बनते हैं   पहाडी के शिखर के नीचे ये बादल कोहरे में बदल जाते हैं |

तटीय कोहरा अधिकतर तटीय क्षेत्रो में बनता है | यह कोहरा विशेषकर उत्तरी अक्षांशो में जब आर्द्र सागर से गुजरने पर संतृप्त बिंदु तक ठंडी हो जाती है तब तटीय क्षेत्रो में छा जाता है | इस प्रकार ककोहरा वसंत और गर्मियों के दिनों में बनता है जो दक्षिणी-पश्चिमी और उत्तरी सागर तटीय क्षेत्रो को प्रभावित करता है |

कोहरा और कुहासा दोनों हवा के निलंबित कणों पर जल कि सूक्ष्म बुँदे से बने होते हैं | इनमे जल की सूक्ष्म बूंदों के घनत्व के कारण अंतर होता है | कुहासे की तुलना में कोहरे में जल की सूक्ष्म बुँदे अधिक होती हैं | कोहरे कि एक परिभाषा के अनुसार कोहरे में दृश्यता सीमा 1000 मीटर से कम रह जाती हैं | यह सीमा हवाई यातायात व्यवस्था के लिए उचित है लेकिन आम जनता और वाहनों केलिए दृश्यता कि 200 मीटर अधिकतम सीमा अधिक महत्वपूर्ण  है | दृश्यता के 50 मीटर के कम हो जाने पर यातायात सम्बन्धी अनेक अवरोध उत्पन्न होते हैं | 

कोहरा प्राय: ठंडी आर्द्र हवा में बनता है और इसके अस्तित्व में आने कि प्रकिया बदलों जैसी ही होती है | गर्म हवा की  अपेक्षा ठंडी हवा अधिक नमी लेने में सक्षम होती है और वाष्पन के द्वारा यह नमी ग्रहण करती है | ये वह बादल होता है जो भूमि के निकट बनता है | यानी एक बादल कवह भाग जो भूमि के ऊपर हवा में ठहरा हुआ हो कोहरा नही होता बल्कि बादल का वह भाग जो ऊपरी भूमि के सम्पर्क में आता है, कोहरा कहलाता है | इसके अतिरिक्त कोहरा कई अन्य तरीको से भी बनता है | लेकिन अधिकांश कोहरे दो श्रेणियों, एडवेक्शन फोग और रेडिएशन फोग में बदल जाते हैं | दोनों ही प्रकार आम हवा से अधिक ठंडा महसूस होता है | एसा उसमे भरी हुई नमी के कणों के कारण होता है |

दिसम्बर की हाड गलाने वाली ठण्ड के आते ही आवागमन ठहर सा जाता है | वैसे तो समूचे भारत में कोहरे की मार इन दिनों में जबर्दस्त होती है, किन्तु उत्तर भारत विशेषकर आगरा के आगे के इलाकों में कोहरा शनै: शनै: बढ़ता ही जाता हैं | कोहरे केकारण जन जीवन थम सा जाता है |

आंकड़ो के अनुसार सड़क दुर्घटना में साल दर मरने वालों कि संख्या में बढ़ोत्तरी के लिए कोहरा एक प्रमुख कारक के तौर पर सामने आया है | अमूमन नवम्बर के अंतिम सप्ताह से फरवरी के पहले सप्ताह तक उत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्र कोहरे की चादर लपेटे हुए रहते हैं |

कोहरे के चलते कहीं कहीं तो दृश्यता शून्य तक हो जाती है | रात हो या दिन वाहनों की तेज लाइट भी बहुत करीब आने पर चिमनी कि तरह ही प्रतीत होती है | यही कारण है कि घने कोहरे के कारण सर्दी के मौसम में सड़क दुर्घटनाओं में तेजी से इजाफा होता है |

कोहरे के बारे में प्रचलित तथ्यों के अनुसार सापेक्षिक आद्रता सौ फीसदी होने पर हवा में जलवाष्प कि मत्रा एकदम स्थिर हो जाती है | इसमें अतिरिक्त जलवाष्प के शामिल होने अथवा तापमान में और अधिक कमी होने से संघनन आरंभ हो जाता है | इस तरह जलवाष्प की संघनित सूक्ष्म सूक्ष्म पानी बूंदें इकट्ठी होकर कोहरे के रुप मे फ़ैल जाती हैं |

पानी कि एक छोटी सी बूंद के सौवे हिस्से को संघनन न्युक्लियाई अथवा क्लाउड सीड भी कहा जाता है | धुल मिट्टी के साथ तमाम प्रदुषण फैलाने वाले तत्व क्लाउड सीड की सतह पर आकर एकत्र होते हैं, और इस तरह होता है कोहरे का निर्माण | वेज्ञानिकों के अनुसार यदि वायुमंडल में इन सूक्ष्म कणों की संख्या बहुत ज्यादा हो तो सापेक्षिक आद्रता शत प्रतिशत से कम होने के बावजूद भी जलवाष्प का संघनन आरम्भ हो जाता है |

दरअसल बूंदों के रूप में संघनित जलवाष्प के बादल रूपी झुंड को कोहरे की संज्ञा दी गई है | कोहरा वायुमंडल में भूमि की सतह से कुछ उपर उठकर फैला होता है | कोहरे में आसपास की चीज़े बहुत ही कम दिखाई पडती हैं, कहीं कहीं तो विसिबिलटी शून्य तक हो जाती है |

देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में दिसम्बर से फ़रवरी तक आवागमन के साधन निर्धारित समय से दुरी से ही या तो आरम्भ होते हैं अथवा पहुंचते हैं | इसका प्रमुख कारण कोहरा ही है |

दरअसल प्रदुषण भी कोहरे के बढ़ने केलिए उपजाउ माहौल पैदा कर रहा है | आंकड़े बताते हैं कि 1980 के दशक में देश में घने कोहरे का औसत समय आधे घंटे था, जो बढ़कर 1995 में एक घंटा और फिर गुणोत्तर तरीके से बढ़ते हुए 2 से 4 घंटे पहुँच गया है | जानकारों का मानना है कि साठ के दशक के उपरांत आज घने कोहरे का समय लगभग बीस गुना बढ़ चूका है |

विडम्बना ही कही जाएगी कि इक्कीसवी सदी में भी भारत ने कोहरे से निपटने के लिए कोई ठोस कार्ययोजना अब न्हीब्ना सकी है | माना जाता है कि सरकार इस समस्या को साल भर में एक से डेढ माह की समस्या मानकर ही छोड़ देती है,जबकि वास्तविकता यह है कि कोहरे के चलते देश में हर साल आवागमन के दौरान होने वाली मौतों में से 4 फीसदी मौतें पुअर विजिबिलटी के कारण होती हैं |

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