यूआईएसजी की सभा में 700 सुपीरियर जेनेरल सहभागी

यूआइएसजी की आमसभा का उद्घाटन सिस्टर जोलांदा कफका ने सोमवार सुबह को रोम में किया तथा 700 सुपीरियर जेनेरलों को निमंत्रण दिया कि वे सिनॉडल यात्रा में दुर्बलता विषय पर खोज करें।
यूआईइसजी (सुपीरियर जेनेरलों के अंतराष्ट्रीय संघ) की अध्यक्ष सिस्टर जोलांदा काफका ने सभा का उद्घाटन करते हुए सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया। करीब 500 से अधिक सुपीरियर जेनेरल रोम में उपस्थित हैं और लगभग 200 सुपीरियर जेनेरल ऑनलाईन सभा में भाग ले रहे हैं जिन्होंने हाथ हिलाकर अपनी सहभागिता दर्ज करायी।
उसके बाद सिस्टर जोलांदा ने सभी महिला धर्मसमाजियों को निमंत्रम दिया कि वे विशाल आलिंगन के लिए अपनी बाहें खोलें। यह भाव न केवल सामाजिक दूरी के नियम का पालन करने के लिए किया गया बल्कि यह याद दिलाने के लिए भी कि वे सचमुच उन लोगों का आलिंगन करती हैं जिनके बीच वे सेवा दे रही हैं, जो समाज में सबसे कमजोर हैं। सिस्टर जोलांदा ने धर्मबहनों को स्मरण दिलाया कि सप्ताहभर के कार्यक्रम का आधार है, "ख्रीस्त के प्रकाश में, हमारी आशा"। इस तरह इस सम्मेलन में जो काम किया जाएगा, उसे कलीसिया की बड़ी सभा में पहुँचाया जाएगा। सभा के प्रतिभागियों ने सभा के गीत गाते हुए कुछ समय प्रार्थना में बिताया।
"हमारी दुर्बलता और गरीबी में ईश्वर चमत्कार कर सकते हैं...हमारी कमजोरी में ईश्वर की कृपा पूर्ण है।"
तत्पश्चात् सभी धर्मबहनों ने कृपा की याचना करते हुए अपनी-अपनी भाषा में "हे हमारे पिता" की प्रार्थना को एक साथ दोहराया।
सभा की विषयवस्तु के पहले आयाम पर प्रकाश डालते हुए डॉ. टेड डुन ने परिवर्तन की गतिशीलता की व्याख्या की। उन्होंने कहा, "अपनी दुर्बलता को स्वीकार करना परिवर्तन के आंतरिक और पारस्परिक कार्य का हिस्सा है। उन्होंने सुपीरियर जेनेरलों को याद दिलाया कि धर्मसमाजी जीवन पहले ही, येसु के समय से ही कई जीवनचक्र परिवर्तनों से गुजर चुका है।" यह व्यक्ति और उसके इतिहास में निहित है कि मौत अंतिम शब्द नहीं है ... धर्मसमाजी जीवन पुनः जागृत होगा। यह पुनःजागरण "धार्मिक समुदायों [जो] अब एक भव्य चौराहे पर, जो था और जो अभी आनेवाला है, के बीच एक दहलीज पर है।" अंत में डॉ. डुन ने याद दिलाया कि "दुनिया को न केवल आपकी आशा की जरूरत है बल्कि परिवर्तन के एजेंट के रूप में आपकी सक्रिय सहभागिता की भी।"
दोपहर के सत्र में तीन धर्मबहनों ने व्यक्तिगत साक्ष्य प्रस्तुत किया। कोविड-19 महामारी के दौरान अपनी दुर्बलता का अनुभव साझा करते हुए सिस्टर कार्मेन मोरा सेना, संत अन्ना की चैरिटी की धर्मबहनों की सुपीरियर जेनेरल ने बतलाया कि उन्होंने अपने नेतृत्व की सेवा को दुर्बलता के दृष्टिकोण के साथ सम्पन्न किया, यह यकीन करते हुए कि आज यही नेतृत्व का तरीका है। जब कोविड के कारण कई मौतें हो रही थीं तब उन्होंने बतलाया कि उन्हें कम्प्यूटर खोलने में डर लगता था कि कहीं और मृत धर्मबहनों, जवान धर्मबहनों की श्रद्धांजलि की सूचना न मिले। उन्होंने उन चुनौतियों को भी सामने रखा जिनके बीच उनके धर्मसमाज की धर्मबहनों ने स्वास्थ्य देखभाल एवं शिक्षा के कार्यों को जारी रखा। महामारी ने अस्थायी रूप से व्रतधारण में कई धर्मबहनों के मन्नत नवीनीकरण में भी बाधा डाली। इन सबके बीच उन्होंने अनिश्चितताओं में जीना सीखा, उन चीजों को स्वीकार करना जो हमारे वश में नहीं हैं और वास्तविकता को स्वीकारना और समर्थन देना एवं सब कुछ को ईश्वर के हाथों सौंप देना सीखा।
प्रेरितों की रानी की मिशनरी धर्मबहनों की सुपीरियर जेनेरल सिस्टर अन्ना फलोला ने कहा कि दुर्बल होने के अलावा ख्रीस्तीय होने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है। अफ्रीका से लातीनी अमरीका के मिशनरी के रूप में उन्होंने महसूस किया कि उनकी कमजोरी ही उनकी शक्ति थी। एक अफ्रीकी के रूप में अपने साथ उन्होंने जो मिसाल लाईं, उससे उन्हें अपने मिशन क्षेत्र में अपने अनुभवों को नेविगेट करने में मदद मिली। अंत में सिस्टर अन्ना ने महिलाओं के साथ येसु की मुलाकात के दृश्य को प्रस्तुत किया।
"येसु हमें दुर्बलता के महत्व पर पुनः एक बार स्पर्श करते हैं जो न केवल धर्मसमाजी जीवन का आदर्श है बल्कि मिशन की जड़ भी है।
लेबनान में जन्मी, मरियम की फ्राँसिसकन मिशनरी समुदाय की सुपीरियर जेनेरल सिस्टर सिहाम जगहेब ने सिरिया के अलेप्पो से वर्चुवल रूप में यूआईएसजी सभा को सम्बोधित किया।
उन्होंने सशस्र संघर्ष के वर्षों में अपने समुदाय की यात्रा को साझा किया। अपहरण, बलात्कार, अत्याचार, भेल पहनने के दबाव आदि खतरों के बीच उनकी एक ही इच्छा थी कि उनका विश्वास कमजोर न हो अथवा उसके त्यागने की नौबत न आये। सिस्टर सिहाम ने बतलाया कि उन्हें शक्ति क्रूस से मिली जिनसे वे हमेशा चिपकी रहती थीं। पवित्र संस्कार के सामने आराधना ने उनके विश्वास को मजबूत किया, ऐसे समय में भी जब संघर्ष उन्हें प्रभु के प्रकाश को देखने से रोक देता था। उनके समुदाय से बार बार पूछा गया कि क्या वे अलेप्पो छोड़ना चाहती हैं, तब संस्थापिका के समान उनके जवाब होते थे, "अंधकार के समय में, हम अपना निर्णय नहीं बदलेंगी जिसको हमने प्रकाश में लिया है।"

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