दक्षिणी अफ्रीका स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए क्या रह गया है

दक्षिणी अफ्रिका में 27 अप्रैल को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है जहाँ 1994 में पहली बार लोकतांत्रिक चुनाव किये गये।
27 अप्रैल 1994 को पहली बार वोट डालने के लिए शहरों, कस्बों, गांवों और व्यापक-खुले स्थानों में, दक्षिण अफ्रीका के लोगों को घंटों तक सूर्य के नीचे धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते हुए, दुनिया भर के लोगों ने विस्मय से देखा था।
नेलशन मंडेला के नेतृत्व में इस वोट ने 300 साल लम्बे उपनिवेशवाद, अलगाव और श्वेत अल्पसंख्यक शासन को समाप्त किया तथा नये लोकतंत्रिक सरकार एवं नये संविधान की स्थापना की।  
स्वतंत्रता दिवस हर साल 27 अप्रैल को मनाया जाता है यह मुक्ति संग्राम की भी याद दिलाता है जिसने सभी के लिए स्वतंत्रता एवं प्रतिष्ठा की पहचान लाया। इस अवसर पर दक्षिणी अफ्रीका के राष्ट्रपति धन्यवाद ज्ञापन समारोह का नेतृत्व करते हैं।   
स्वतंत्रता प्राप्ति के 28 साल बीत जाने पर दक्षिणी अफ्रिका के कई लोग अपने आप से पूछ रहे हैं कि क्या इस दिन को मनाया जाना चाहिए जब बहुत सारे नागरिक गरीबी, असामानता और अधिकार की कमी से जूझ रहे हैं।  
दक्षिण अफ्रिका के लिए जेस्विट संस्थान के निदेशक फादर रूसेल पोलित ने वाटिकन रेडियो को उन संकटों एवं राजनीतिक वर्ग में गहरा जड़ जमाये भ्रष्टाचार के बारे बतलाया जो देश को अब भी परेशान कर रहे हैं। उनका सोचना है कि कई दक्षिणी अफ्रीकी इस दिवस को नहीं मना सकते।  
फादर पोलित ने कहा कि देश निश्चय ही बदला है जहाँ आज सभी को वोट देने का अधिकार है। "किन्तु मैं सोचता हूँ कि कुछ मायनों में, कोई कह सकता है कि रंगभेद व्यवस्था को 28 साल बाद, एक ऐसी प्रणाली में बदल दिया गया है जो गरीब से गरीब व्यक्ति को भी नुकसान पहुंचा रही है।”
उन्होंने कहा, "यह बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और लूटपाट की एक प्रणाली है और नागरिकों को मानव अधिकार के संबंध में दक्षिणी अफ्रीका की सरकार पर भरोसा नहीं है।"
उन्होंने अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि नेल्सन मंडेला द्वारा समर्थित मानवाधिकारों की विरासत को भुला दिया गया है, और यहां तक कि धोखा भी दिया गया है, जिसको पिछले 15 वर्षों में दक्षिण अफ्रीका में हुई कई चीजों से देखा गया है।
उन्होंने कहा कि खासकर, कमजोर लोगों के अधिकारों को कुचल दिया गया है और उन लोगों के साथ कोई कारर्वाई नहीं की गई है जो इसके लिए जिम्मेदार हैं।
2013 में मारीकाना सोने की खान में खनिक मजदूरों के प्रदर्शन में पुलिस द्वारा 30 लोग मारे गये थे और तथाकथित एसीदिनेनी संकट में विकलांग लोगों को घर एवं स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित कर दिया गया था, जिसमें कई लोगों की मौत भूख से हो गई थी।  
फादर पोलित ने देश की "यूक्रेन में संघर्ष के लिए मौन प्रतिक्रिया" और कैसे "यह बतला रहा है कि दक्षिण अफ्रीका यूक्रेन में रूसियों के हाथों हो रहे मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने के लिए तैयार नहीं है," पर भी सवाल किया।
उन्होंने कहा कि "अतः मानव अधिकार का सवाल एक ऐसा सवाल है जिसको मैं सोचता हूँ कि यह एक विवादास्पद सवाल है। दक्षिण अफ्रीका के पास एक सुन्दर संविधान है और नियम-कानून भी हैं लेकिन सबसे बड़ी समस्याएँ हैं, कि उन्हें लागू नहीं किया गया है और उनपर नहीं चला जाता है।" अतः वैधानिक पुस्तकों और धरातल पर लागू किये जाने के बीच बहुत बड़ी खाई है।
जेस्विट संस्थान के निदेशक ने महामारी के कारण उत्पन्न संकट के बीच भारी मात्रा में लूट और भ्रष्टाचार पर भी गौर किया। उन्होंने कहा, "हाल में फायरिंग या स्वास्थ्य मंत्री का इस्तिफा देना क्योंकि कोविड महामारी के दौरान चोरी के कारण उसके परिवारों को फायदे हुए और खासकर, अत्यन्त गरीब लोगों की सुरक्षा की चोरी हुई।"
उन्होंने कहा," यह एक दूसरा उदाहरण है जो दिखलाता है कि वे सचमुच देखभाल नहीं कर सके।"    
फादर पोलित ने अंत में कहा कि "मैं कह सकता हूँ कि अब दक्षिण अफ्रीका के बहुत सारे लोग कहते हैं कि आमतौर पर हमारी सरकार मानव अधिकार पर विश्वास नहीं करती।"

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