चरनी, एक जीवित सुसमाचार

चरनी

चरनी वास्तव में "एक जीवित सुसमाचार के समान है"। हम जहाँ रहते हैं, घरों, स्कूलों, कार्यालयों, सभा स्थलों, अस्पतालों और चिकित्सालयों, कैदखानों एवं चौराहों में सुसमाचार लायें। हम जहाँ रहते हैं यह एक विशेष बात की याद दिलाती है कि ईश्वर स्वर्ग में अदृश्य बनकर नहीं रहे किन्तु धरती पर आये, मनुष्य बने, एक बालक का रूप धारण किया।चरनी बनाना ईश्वर के सामीप्य को महसूस करना है। ईश्वर हमेशा अपने लोगों के करीब रहे किन्तु जब उन्होंने शरीर धारण किया और जन्म लिया तब वे अत्याधिक करीब आ गये। चरनी बनाने का अर्थ है उनकी करीबी को मनाना और इस बात को जानना कि ईश्वर सच्चे, यथार्थ, जीवित और उत्साह देने वाले हैं। ईश्वर दूर रहने वाले व्यक्ति नहीं है और न ही बेलगाव न्यायधीश, बल्कि वे दीन और प्रेमी बनकर हमारे पास आये। चरनी के बालक हमें अपनी कोमलता प्रदान करते हैं।कुछ प्रतिमाओं में बालक येसु को खुली बाहों के साथ दिखलाया जाता है यह बतलाने के लिए कि ईश्वर हमारी मानवता का आलिंगन करने आये हैं। अतः यह अच्छा है कि हम चरनी के सामने जाएँ तथा वहाँ प्रभु के जीवन पर भरोसा करें। लोगों के बारे उनसे बाते करें, उन्हें उन परिस्थितियों के बारे बतलायें जिसकी चिंता हम करते हैं, समाप्त होते साल का आवलोकन करें। अपनी आशाओं एवं चिंताओं को उन्हें सुनायें।

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