विनम्रता से पश्चाताप। 

ईश्वर के सामने हम क्या हैं? उनके सामने हमारी हैसियत ही क्या है? कुछ नहीं। अतः ईश्वर के सामने हम अपना बड़प्पन न दिखायें तो ही अच्छा है। उसका सामर्थ्य अपार है। उसकी योजनायें अविश्वसनीय हैं। उसके कार्य आश्चर्यजनक हैं। वह किसी से पक्षपात नहीं करता है। वह किसी से अन्याय नहीं करता है। अतः हमें बड़ी विनम्रता से उसके सामने नतमस्तक होना चाहिए। तोबीत यह बात अच्छी तरह समझता था। इसीलिए उसने बड़ी विनम्रता से अपनी परिस्थिति के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हुए पश्चाताप किया। अपनी एक कमजोरी यही है कि अपनी दु: खद परिस्थिति के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं और तो और ईश्वर के प्रति हमारी सोच तथा हमारा रवैया भी ऐसा ही होता है। हम उसके विरुद्ध कुड़कुड़ाते हैं। हमारी परिस्थिति सुधरने के बदले और बिगड़ती हैं। कभी- कभी तो वह बद से बदतर हो जाती है। तोबीत और रागुएल की पत्नी सारा का आचरण हमसे विपरीत था। फलतः ईश्वर की महती दया उनपर रही। उनकी परिस्थितियाँ बदल गयीं। अगर हम भी अपनी बिगड़ी परिस्थितियों को बदलते देखना चाहते हैं तो ईश्वर के प्रति हमारे नजरिए में बदलाव लाना जरूरी है। चमत्कार अवश्य होंगे।

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