वर्ष का 20वां सप्ताह - बुधवार, 17 अगस्त

वर्ष का 20वां सप्ताह - बुधवार, 17 अगस्त
एज़ेकिएल 34:1-11, 23 स्त्रोत्र:1-6, मत्ती 20:1-16

 ’तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ, मैं तुम्हें उचित मज़दूरी दे दूँगा।’ (मत्ती 20:4)

क्या आप परेशान नहीं होंगे यदि आप पूरे दिन काम करते हैं और आपको उसी राशि का भुगतान किया जाता है जो उसे भी दिया जाता है जो सिर्फ एक घंटे काम करता है? आप अपने मालिक को बताएंगे कि "यह उचित नहीं है!"
लेकिन यह दृष्टान्त एक जमींदार की दृष्टि से भी उचित नहीं लगता। यहां तक ​​कि अगर वह अपने मजदूरों को समान मजदूरी देना चाहता था, चाहे उन्होंने कितने भी समय तक काम किया हो, वह नहीं कर सकता था। वह जल्दी ही कंगाल हो जाएगा और उसे अपनी जमीन बेचनी होगी!
जब ज़मींदार ईश्वर होता है, तो कोई सीमा नहीं होती है। वह अनंत है, और उसकी कृपा भी ऐसी ही है। इसे मापा या भागों में विभक्‍त नहीं किया जा सकता है, और यह कभी खत्म नहीं होता है। वह इसे उन लोगों पर उंडेलता रहता है जिन्हें उसने बनाया है और बहुत प्यार करता है- चाहे उन्होंने जीवन भर उसके लिए काम किया हो या अपनी मृत्यु से कुछ मिनट पहले उसकी ओर रुख किया हो। यह वह शुभ समाचार है जो येसु हमारे साथ बांटने आये थे।
यहाँ और भी अच्छी खबर है जो हम इस दृष्टान्त से प्राप्त कर सकते हैं। एक बार जब दिन समाप्त हो जाता है, तो हमारी "मजदूरी" भी हमारे ईश्वर के साथ अनन्त जीवन में अनंत हो जाएगी। स्वर्ग में, हम इस बारे में नहीं सोचेंगे कि किसने अधिक समय तक और अधिक मेहनत की या कौन कम या ज्यादा के योग्य था। इसके बजाय, हम एक स्वर से आनन्दित होंगे, ईश्वर और एक दूसरे के प्रेम में एक हो जाएंगे।
हम सभी में न्याय की भावना होती है जो पुकारकर कहती है, "यह उचित नहीं है!" यह एक अच्छी बात हो सकती है जब यह हमें हमारे समाज में अन्यायपूर्ण स्थितियों से निपटने के लिए उत्साहित करती है। ईश्वर इन बातों की परवाह करता है, जैसा हमें करना चाहिए। लेकिन जब ईश्वर की दया, अनुग्रह, और हम में से प्रत्येक को देने के लिए उसके द्वारा मारे गए अनन्त जीवन की बात आती है तो "यह उचित नहीं है" जैसी कोई चीज नहीं है।
येसु जानते थे कि हम इस दृष्टांत को झकझोरने वाले पाएंगे। मनुष्य के रूप में, हम सीमाओं और तुलनाओं के अभ्यस्त हैं। उसने यह हमारी समझ का विस्तार करने के लिए कहा कि ईश्वर कितना उदार है और वह कितना चाहता है कि हम उसके साथ जुड़े रहें। तो भले ही यह संघर्ष ही क्यों न हो, आज उस आनंद की कल्पना करने की कोशिश करें जो आप स्वर्ग में महसूस करेंगे जब आपके भाई और बहनें जो आपके बाद में दाख की बारी में आए थे, वही आशीर्वाद प्राप्त कर रहे थे जिसका आप आनंद ले रहे हैं। वह कैसा उत्सव होगा!
"येसु, मैं आपकी असीम, कभी न खत्म होने वाली कृपा और दया के लिए आपकी प्रशंसा करता हूं जो आप मुझ पर डालते हैं!"

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