येसु ने अपनी शक्ति हमें भी दी है। 

आज के सुसमाचार को हम दो भागों में बाँट सकते हैं- 1. ये क्रिया - कलापों का संक्षिप्त सारांश और 2. मिशन पर अनुदेश। इससे पहले के अध्यायों में विशेषकर अध्याय 5 से अध्याय 7 तक में हम पाते हैं कि येसु ने जीवन के विभिन्न पहलुओं एवं बिन्दुओं पर अपने शिष्यों और अनुयायियों को प्रवचन दिया। उपदेश समाप्त करने के बाद, पहाड़ी से उतर कर उन्होंने चंगाई का काम करना शुरू किया। उन्होंने कोढ़ग्रस्त, लकवाग्रस्त, अपदूतग्रस्त और अन्य प्रकार के रोगों से ग्रसित लोगों को चंगा किया। इस प्रकार आज के सुसमाचार के प्रथम भाग में हम पाते हैं कि येसु ने आस- पड़ोस के गाँवों- कसबों में घूम- घूमकर स्वर्गराज्य के सुसमाचार का प्रचार किया और बीमारों को चंगा किया। उसने लोगों के आने की प्रतीक्षा नहीं की वरन् वह स्वयं गये। उसने उनके प्रार्थनालयों में जहाँ लोग जमा होते थे जाकर शिक्षा दी।
सुसमाचार के दूसरे भाग- मिशन पर अनुदेश में पाते हैं कि प्रभु के ये काम देखकर उनके अनुयायियों एवं श्रोताओं की संख्या बढ़ती जा रही थी। येसु के लिये मिशन काम को अकेले आगे बढ़ाना कठिन हो रहा था। अतः शिष्यों को प्रशिक्षित कर, रोगों, अपदूतों और नरकदूतों पर अधिकार देकर उसने यह कहते हुए शिष्यों को भेजा- "जाओ, राह चलते यह उपदेश दिया करो- स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है। रोगियों को चंगा करो, मुरदों को जिलाओ, कोढ़ियों को शुद्ध करो, नरकदूतों को निकालो। तुम्हें मुप्त में मिला है, मुप्त में दे दो।" ( मती 9 : 8) येसु ने संस्कारों द्वारा हमें भी ऐसी शक्ति दी है। क्या हम इन शक्तियों का प्रयोग स्वर्ग राज्य के विस्तार के लिये कर रहे हैं? चिन्तन करें।

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