पवित्र सप्ताह 2022

जय येसु की। ख्रीस्त में प्यारे भाइयों और बहनों। पवित्र सप्ताह शुरू होने वाला है। कल खजूर रविवार है। पवित्र सप्ताह की तैयारी में, मैं आप लोगों के सामने येसु मसीह के संग में एक सप्ताह प्रार्थना की तहत मनन- चिंतन की एक श्रखंता प्रस्तुत करना चाहता हूँ । हालाँकी आज के मनन- चिंतन का विषय है: चलो! येरूसलेम की ओर चलें। 
जी हाँ। प्रभु येसु को सीयोन पर्वत याने दाऊद का गढ़ येरूसलेम जाना जरूरी था। येरूसलेम वह स्थान है जहाँ ईश्वर द्वारा भेजे गये हर नबी मार डाला जाने वाला था। लूकस के अनुसार पवित्र सुसमाचार में स्वयं प्रभु येसु स्पष्ट कहते है- "आज कल और परसों मुझे यात्रा करनी है क्योंकि यह हो नहीं सकता कि कोई नबी येरूसलेम के बाहर मरें।" लूकस 13:33 
संत मत्ती, मारकुस और लूकस के अनुसार सुसमाचार हमें यह बताते हैं कि प्रभु येसु अपने बारह शिष्यों को धीरे- धीरे तैयार कर रहे थे। ताकि वे अपनी येरूसालेम की यात्रा को स्वीकार करें जो कि वह ईश्वर की इच्छा थी। लेकिन दुरभाग्यवश येसु के शिष्य असंवेदनशील, गैर- जिम्मेदार और प्रभु येसु के विचारों के विपरीत थे और उन से बहुत दूर अपनी ही दुनिया एवं अपने ही विचारों में हुबे हुए थे। प्रभु येसु और उनके शिष्यों की बीच में एक भारी गर्त है। परन्तु प्रभु ने अपने शिष्यों पर अपनी आशा कभी नहीं खोई। हर बार जब प्रभु के शिष्यों ने व्यक्तिगत रूप से या सामूहिक रूप गलती की, उन्होंने उस अवसर का फायदा उठाकर उन्हें कुछ आवश्यक शिक्षा देने की कोशिश की ताकि वे अर्थपूर्ण तरिके से प्रभु का अनुसरण कर सके। इस बात की अच्छी तरह समझ ने के लिए मैं संत मारकुस के अनुसार सुसमाचार की मदद लेना चाहता है और इस तथ्य की स्पष्ट करना चाहता हूँ। जैसा कि अन्य समसामयिक सुसमाचारों में होता है, यहाँ भी प्रभु येस अपने शिष्यों को बताते हैं कि येरूसालेम में उनके साथ क्या क्या होने वाला है। मारकुस के अनुसार सुसमाचार में हम 8:31, 9:31 और 10: 33-34 में तीन बार पड़ते हैं: 
मारकुस: 8:31 में हम पढ़ते हैं: “उस समय से येसु ने अपने शिष्यों को स्पष्ट शब्दों में यह समझाने लगे कि मानव पुत्र को बहुत दुख उठाना होगा; नेताओं, महायाजकों और शास्त्रयों द्वारा टुकराया जाना, मार डाला जाना और तीन दिन के बाद जी उठना होगा।
जैसा के प्रभु येसु ने यह बताया जो हुआ वह कुछ ऐसा था जिसकी अपेक्षा शायद स्वयं प्रभु ने नहीं की थी, वह भी बारहों के नेता संत पेत्रुस से। संत पेत्रुस ने ऐसा क्या किया? जैसा हम मारकुस 8:32 पढ़ते हैं: पेत्रुस येसु को अलग ले जा कर फटकारने लगा। जी हाँ प्यारे भाइयों और बहनों, पेत्रुस ने केवल येसु की संगति में येरूसलेम जाने के लिए तैयार नहीं था बल्की वह नहीं चाहता था कि येसु भी येरूसलेम न जावें। येसु ने इस विद्राह के खतरे को समझ लिया था। वह गहराई से जानता था कि पेत्रुस का यह रवैया ईश्वर से प्रेरित नहीं था। यह शैतान का काम था।
तो हम यह जानना चाहते हैं कि प्रभु येसु ने इस स्थिति का सामना कैसे किया? मारकुस 8:33 में हम पढ़ते हैं, "किन्तु येसु ने मुड़कर अपने शिष्यों की ओर देखा और पेत्रुस को डाँटते हुए कहा, हट जाओ शैतान तुम ईश्वर की बातें नहीं बल्की मनुष्यों की बातें सोचते हों।"

यहाँ प्रभु येसु शिष्यत्व की कीमत और महत्व पर शिक्षा देते हैं। जैसे हम मारकुस 8: 34-38 पढ़ते हैं, प्रभु कहते हैं कि शिष्य बनना चाहते है उसे स्वयं के बारे में भूलना होगा। याने आत्मत्याग करना होगा और अपना क्रूस उठाकर प्रभु का अनुसरण करना होगा। सुसमाचार के खातिर अपना जीवन खोने के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा। यह घटना तीन भागों में बाँटा जाता है। बहले भाग में, येसु येरूसलेम में घटनेवाली घटनाओं की भविष्यवाणी करना है। दूसरे भाग में पेत्रुस, येसु के शब्दों पर प्रतिक्रिया करता है और प्रभु अपने शिष्यों को डाटता है। तीसरे भाग में, इस अवसर का फायदा उठाकर शिष्यत्व के महत्व को सिखाते हैं। 
ऐसा कुछ होता है हर बार जब प्रभु येसु अपने मृत्यु और पुनरूत्थान की भविष्यवाणी करता है। आईये देखते हैं। क्या होता है दूसरी घड़ी में। सबसे महले येसु की बातें शिष्यों के समझ के बाहर थे। दूसरे जगह में, वे आपस में वाद- विवाद करने लगे कि सब से बड़ा कौन है? जब प्रभु येसु उनसे पूछता था कि आप लोग रास्ते किस विषय पर चर्चा कर रहे थे। वे चुप हो गये । क्योंकि येस के सामने इस बात को स्वीकार करने में असमर्थ थे। इस अवसर का फायदे उठाते हुए प्रभु येसु विनम्रता के बारे में सिखते हैं। मारकुस, 9:35 में कहते हैं जो पहला होना चाहता है, वह सबसे पिछला और सबका सेवक बने
फिर उसने एक बालक को शिष्यों के बीच खड़ा कर दिया और उसे गले लगाकर उन से कहते हैं: "जो मेरे नाम पर इन बालकों में किसी एक का भी स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है और जो मेरा स्वागत करता है, वह मेरा नहीं बल्कि उसका स्वागत करता है जिसने मुझे भेजा है।" मारकुस 9: 36-37 
प्रभु येसु हम में से हर एक व्यक्ति से व्यावहारिक परिवर्तन की अपेक्षा करते है। सब से पहली अपेक्षा है। वह है दिल से दान। जैसा हम मारकुस 9:41 में पढ़ते हैं "जो तुम्हें एक प्याला पानी इसलिए पिलायेगा कि तुम मसीह के शिष्य हो तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता है कि वह आगे पुरस्कार से वंचित नहीं रहेगा।" 
दूसरा कभी भी किसी का ठोकर खाने का कारण बनने और न किसी को बाधा डालें। जैसे हम मारकुस 9:42 में पढ़ते हैं, "जो इन विश्वास करने वाले नन्हें में किसी एक के लिए भी पाप का बनना है इसके लिए अच्छा यहीं होता कि उसके गले में चक्की का पाट बाँधा जाता और वह समुद्र के फेंक दिया जाता।" 
तीसरा: एक दूसरे के साथ शांति से रहे। मारकुस 9:50 में प्रभु कहते हैं: आपस में मेल रखो। 
तीसरी घड़ी मारकुस, 10: 32-55 पर आधारित है। प्रभु अपने शिष्यों के साथ येरूसलेम जाते है। रास्ते में येसु अपने शिष्यों को एक तरफ बुलाते हैं और कहते हैं कि उनके साथ क्या होने वाला है। इस बार जेबेदी के पुत्र याकूब और योहन प्रभु येसु के पास आकर उनसे अनुरोध करते हैं कि जब येसु अपने राज्यों में महिमा के साथ आयेंगे तो हम में एक को अपने दायें और एक को अपने बायें बिठाना है। प्रभु जानना चाहते हैं कि याकूब और योहन उस प्याले में पियेंगे जिसमें स्वयं पीने वाले हैं। दोनों शिष्य सकरात्मक उत्तर देते हैं। वे तैयार हैं। वास्तव में दोनों अपने जीवन के अंत तक येसु के प्रति वफादार रहे। मौके का फायदा उठाकर येसु अपने शिष्यों को सिखाते हैं कि अधिकार सेवा है। जो लोग अधिकार में वह दूसरों पर अधिकार नहीं करना चाहिए बल्कि सेवक बनना जरूरी है। यह नेतृत्व सेवा है। प्रभु मारकुस 10: 45 में कहते हैं: “मानव पुत्र अपनी सेवा कराने नहीं बल्कि सेवा करने और बहुतों के उद्धार के लिए अपने प्राण देने आया है।"
 4 क्या हम प्रभु येसु के साथ येरूसलेम जाने के लिए तैयार है? क्या हम वास्तव में प्रभु येसु के मरण पीड़ा, मृत्यु और पुनरूत्थान के रहस्य में भाग लेना चाहते हैं? पवित्र सप्ताह में हम रीति रिवाजों पर ज्यादा जोर देते हैं। वे जरूरी भी है। परन्तु इस साल पर्याप्त मात्रा में भक्ति भावना के साथ प्रभु के दुखभोग में भाग लेने की कोशिश करें। आमेन ।

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