चुनौतियों का सामना करने के साहस के साथ नबी बनें

सन्त मती अध्याय 17 : 1-8 में हम सबों ने देखा कि एक ऊँचे पहाड़ पर एकान्त में, प्रभु येसु का रूपान्तरण, अपने तीन शिष्यों के सामने हुआ। उन्होंने दमकते येसु को मूसा और एलियस से बात- चीत करते देखा। उन्हें स्वर्गिक अनुभूति की हलकी झलक मिली। संहिता के प्रतिनिधि मूसा एवं नबियों के प्रतिनिधि एलियस, यहूदियों के लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं। फलतः जब येसु ने उन्हें इस घटना की चर्चा करने से मना कर दिया तो वे और ही असमंजस में पड़ गये। इसीलिये उन्होंने येसु से पूछा- "शास्त्री यह क्यों कहते हैं कि पहले एलियस को आना है?" (मती 17:10) येसु ने संहिता के इस कथन को नकारा नहीं वरन् इस कथन के अर्थ की गहराई को समझाते हुए उनकी अन्धेपनको दूर किया। उसने कहा "एलियस अवश्य सब कुछ ठीक करने आयेगा। परन्तु मैं तुम लोगों से कहता हूँ- एलियस आ चुका है। उन्होंने उसे नहीं पहचाना और उसके साथ मनमाना व्यवहार किया।" ( मती 17:11, 12) शिष्य और शास्त्री एलियस को संहिता में वर्णित विशेषताओं के साथ शारीरिक रूप में देखना चाहते थे। उनकी समझ में एलियस बादलों से होकर अग्नि के रथ में सशरीर आता। येसु ने उनके ज्ञान और समझ की कमी को दूर करते हुए बताया कि एलियस को सशरीर नहीं वरन् व्यक्तित्व में पहचानना है। एलियस में निम्नलिखित कुछ विशेषताएँ थी- प्रभु के नबी के रूप में वह पहाड़ियों एवं निर्जन प्रदेश में रहता था। वह प्रभु का सच्चा भक्त और सेवक था। अपने जीने- खाने के लिये वह पूर्ण रूपेण प्रभु पर आश्रित रहता था। यहोवा ने उसे बादलों को रोकने की शक्ति दी थी। उसने अपनी नबूवत द्वारा इस्राएल के शासकों को उनकी कमजोरियों से अवगत कराया। ये सारी खूबियाँ योहन बपतिस्ता में निहित थीं।

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