ख़ुश रहो और एक दूसरे की मदद करो 

जब कोई महँ हस्ती या नेता चाहे वह राजनितिक हो या धार्मिक, हमारे बीच आते है तो हम उनके स्वागत की तैयारी करते है। संयोजक मंडली के सदस्य, आम जनता, प्रशासन और अन्य क्रियाशील सदस्य पूछते है- हमें क्या करना है?
आज के सुसमाचार में ऐसा ही नजारा है। समस्त यहूदी जाति गुलामी और दास्ता की बेड़ी सहते- सहते थक गयी थी। इसके बावजूद उनके नबियों - इसायस, येरेमियस आदि ने बार- बार लोगों को आश्वासन दिया था कि उनका मुक्तिदाता आकर उनको गुलामी से छुड़ायेगा। "मेरी प्रजा को सान्त्वना दो, सान्त्वना दो। येरुसालेम को ढारस बँधाओ और पुकार कर उससे यह कहो कि उसकी विपति के दिन समाप्त हो गये हैं और उसके पाप का प्रायश्चित हो चुका है।" (इसायस 40 : 1-2) अतः सारी यहूदी जाति अपने मसीहा एवं मुक्तिदाता की प्रतीक्षा में थी। ऐसे ही काल एवं परिस्थिति में योहन बपतिस्ता ने लोगों को पश्चाताप का उपदेश दिया। उसने नबी इसायस के पुस्तक की चर्चा करते हुए कहा प्रभु का मार्ग तैयार करो। उसके पथ सीधे कर दो। योहन ने लोगों को पश्चाताप का उपदेश देते हुए कहा- पश्चाताप के उचित फल उत्पन्न करो और यह न सोचो कि हम इब्राहीम की सन्तान हैं। उनके उपदेश से लोग मर्माहत हो गये और उन्होंने उनसे सुझाव माँगा- हमें क्या करना चाहिए? उसने सबको, सबका जवाब दिया। जनता से उसने कहा- जिसके पास दो कुरते हों, वह एक उसे दे दे जिसके पास नहीं है। जिसके पास भोजन है वह भी ऐसा ही करे। नाकेदारों से उसने कहा- तुम्हारे पास जितना नियत है उस से अधिक मत माँगो। सैनिकों से उसने कहा किसी पर अत्याचार मत करो, किसी पर झूठा दोष मत लगाओ और अपने वेतन से सन्तुष्ट रहो। इस प्रकार योहन ने लोगों को आध्यात्मिक रूप से मसीहा के स्वागत के लिये तैयार किया। आइये अपने आपको देखें- परखें कि हमारी तैयारी किस प्रकार की है।

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