ईश्वर हमसे अनपेक्षित, अप्रत्याशित और आश्चर्यजनक तरीकों से बात करता है।

मनुष्य में एक बहुत बड़ी कमजोरी है शिकायत करने की। यह कमजोरी उसकी असन्तुष्टि को दर्शाती है। पड़ोसी की तरक्की और सफलता से उसे जलन होती है। उनकी तरक्की और सफलता अगर उसके दबदबा एवं वर्चस्व को गौण करने लगती है तो वो व्यक्ति उसका दुश्मन बन जाता है। इस परिस्थिति के कायम होने के बाद, आदमी लाख अच्छा करे, उसे उनमें त्रुटि ही नज़र आती है। आज के सुसमचार में कुछ ऐसी ही बातें होती हैं। 
आज से पहले के पाठों एवं अध्यायों में हम पाते हैं कि येसु ने अनेक प्रकार की शिक्षा दी और चमत्कार किये। उसने शिष्यों को भी चमत्कार करने की शक्ति और अधिकार दी। उसने अनेक अच्छे- अच्छे काम किये। परन्तु फरीसी और शास्त्री छोटी- छोटी चीजों को लेकर ओछी बातें करते हैं। येसु के प्रति उनकी घृणा इतनी जबरदस्त हो गयी है कि उनको येसु के कामों में खोट ही खोट नजर आता है। उनकी सोच और उनका दृष्टिकोण बच्चों की सोच की तरह अपरिपक्व हैं। वे येसु को पियक्कड़ और पेटू कहते हैं। वे छोटे बच्चों की तरह कहते हैं -" हमने तुम्हारे लिये बाँसुरी बजायी और तुम नहीं नाचे। हमने विलाप किया और तुमने छाती नहीं पीटी।” ( मती 11:17 ) किन्तु जैसा कि अच्छा पेड़ बुरा फल नहीं दे सकता है वैसे ही ईश्वर की प्रज्ञा परिणामों द्वारा प्रमाणित होती है। येसु के अच्छे काम, चंगाई, दया, क्षमा आदि के काम लोगों में उनके प्रति आदर सत्कार, मान- सम्मान के भाव पैदा करते हैं। हम मसीहियों पर भी अनेक प्रकार के दोषारोपण होते आये हैं और होते रहेंगे लेकिन हमारी मसीहियत के कामों को फल लाने से कोई रोक नहीं सकेगा।

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