इच्छा 

ईर्ष्या - द्वेष, स्वार्थ और वासना हमेशा से जानलेवा रही हैं। सामान्य सी दिखाई देने वाली बुराईयाँ महामारी की तरह घातक सिद्ध होती हैं। आज के दोनों पाठों में मानवीय कमजोरियों को दर्शाया गया है। पहले पाठ में इस्राएल के बेटे अपने भाई योसेफ से बैर करते थे और अच्छी तरह से बात भी नहीं करते थे क्योंकि उनका पिता योसेफ उसे अधिक प्यार करता था। योसेफ को उनके भाइयों ने मार डालने का निर्णय ले लिया था पर रुबेन के कहने पर उसे छोड़ दिया और इस्माइलियों के हाथों बेच दिया। सुसमाचार पाठ में भी हम सुनते हैं कि किस प्रकार दुष्ट असामियों ने बहुतों को मार डाला और अंत में उन्होंने उत्तराधिकारी को भी नहीं छोड़ा। क्योंकि वे सारी सम्पत्ति हथियाना चाहते थे।
ईश्वर की मर्जी के सामने किसी की नहीं चलती है। मनुष्य लाख प्रयास कर ले अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए लेकिन ईश्वर की अपनी योजना होती है और वह अपने नीयत समय में सब कुछ पूरा करेंगे। हर विपरीत परिस्थिति में ईश्वर अपनी महिमा और सामर्थ्य को प्रकट करते हैं। हम निरे मनुष्य ईश्वर की इस अद्भूत लीला को कभी समझ नहीं पायेंगे। वह खुद या किसी की मध्यस्थता के द्वारा अपने कार्य को पूरा करते हैं। ईश्वरीय अनुभूति को प्राप्त करने के लिए एक व्यक्ति को अहम् से बाहर निकलना होगा और सकारात्मक व्यक्तित्व अपनाना होगा।
मिस्र में योसेफ की मध्यस्थता से ईश्वर ने उनके परिवार को सुरक्षित रखा और अपनी प्रतिज्ञा पूरी की ईश्वर का काम कभी रुक नहीं सकता है। ईश्वर का कार्य अपने निर्धारित समय में पूरा होता है। दुष्ट असामियों से पट्टा लेकर उन असामियों को जिम्मा दिया जाता है जो ईमानदार और निष्ठावान हैं और जो समय पर हिस्सा देते हैं। जो ईश्वरीय छत्रछाया में रह कर अपना काम करता है उसके कामों में ईश्वर की कृपा और आशीष बनी रहती है। और वह अधिक फल उत्पन्न करता है। ईश्वर के कृपापात्र बनने के लिए हमें विनम्रता की जरूरत है। पश्चात्तापी हृदय लेकर हम ईश्वर के पास आयें और अपने और दूसरों के लिए कृपा का कारण बनें।

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