हिप्पो के संत अगस्तीन

Augustine of Hippo

हिप्पो के धर्माध्यक्ष एवं कलीसिया के धर्माचार्य संत अगस्तिन संत पौलुस के पश्चात कलीसिया के सबसे महान संत माने जाते हैं। 

संत अगस्तिन का जन्म 13 नवम्बर सन 354 ईस्वी में उत्तरी अफ्रीका के अलजीरिया राज्य में टगास्ते नामक नगर में हुआ। उनके पिता का नाम पेट्रीशियस तथा माता का नाम मोनिका था। पेट्रीशियस एक अख्रीस्तीय अफसर थे। मोनिका अत्यंत भक्त ख्रीस्तीय थी जो बाद में संत बनी। अगस्तिन का पालन-पोषण ख्रीस्तीय विश्वास में हुआ किन्तु पिता की अनिच्छा के कारण उन्हें बचपन में बपतिस्मा संस्कार नहीं दिया गया। बालक अगस्तिन बचपन से ही बड़ा प्रखर-बुद्धि, परिश्रमी एवं महत्वकांक्षी था। उन पर माँ की अपेक्षा पिता का अधिक प्रभाव पड़ा। 

मोनिका और पेट्रीशियस के विवाह के अठारह वर्ष बाद पेट्रीशियस ने भी ख्रीस्तीय धर्म ग्रहण किया। किन्तु कुछ ही समय पश्चात उनका देहांत हो गया। अतः अगस्तिन की शिक्षा का सम्पूर्ण भर माँ पर आ पड़ा। मोनिका ने अगस्तिन को उच्च अध्ययन के लिए कार्थेज के विश्वविद्यालय में भेजा। उस समय वे सत्रह वर्ष के थे। वहाँ भी वे अपनी माँ के धार्मिक प्रभाव से दूर ही रहे। कार्थेज उन दिनों उत्तरी अफ्रीका का सुप्रसिद्ध नगर था। अगस्तिन की यही महत्वकांक्षा थी कि मैं एक श्रेष्ठ वक्ता एवं शासकीय अधिकारी बनूँ। किन्तु विश्वविद्यालयके अध्ययन के बीच वे कुसंगति में पड़ गए और भोग विलास में आनंद पाने का प्रयास करने लगे। वे एक युवती के प्रेम जाल में फंस गए और बिना विवाह किये साथ रहने लगे। उससे उनको एक पुत्र भी उत्पन्न हुआ। साथ ही वे मनिकेयी विधर्म को स्वीकार करने के लिए उसका अध्ययन भी कर रहे थे। जब उनकी माँ को इन बातों का पता लगा तो उसने अगस्तिन को वापस टगास्ते बुला लिया। इस पर अगस्तिन माँ के विरोधी बन गए और इसी शहर में माँ से अलग रहने लगे। माँ ने उन्हें सही रास्ते पर लाने के लिए अनेकों प्रयत्न किये। किन्तु सब बेकार गए। अपनी प्यारी माँ के विश्वास पर कुठारघात करते हुए वे एक दिन चुपके से रोम चले गए। वहाँ अपना अध्ययन पूर्ण करके वे वहीं अलंकार-शास्त्र पढ़ाने लगे। इधर उनकी माँ ने अत्यंत दुखी होकर आँसू बहाते हुए अपने प्यारे पुत्र के मन-परिवर्तन के लिए निरंतर प्रार्थना करने लगी।

रोम में अगस्तिन अपनी मिलनसारी, मित्र बनाने की अपूर्व क्षमता, असाधारण नेतृत्व कला इत्यादि विशेष गुणों के कारण बुद्धि जीवियों के दल का प्रनुख बन गए। किन्तु किसी  उन्हें सच्चा आनंद प्राप्त नहीं हुआ और उनका मन शंकाओं से भर गया। ऐसी मानसिक स्थिति में वे मिलान नगर पहुंचे जहाँ उनका परिचय महान धर्माध्यक्ष संत आब्रोस से हुआ। परिचय धीरे-धीरे मित्रता में बदल गया। अगस्तिन की माँ पहले से वहीं पहुंची थी ; और उन्होंने अपने पुत्र के विषय में सारी जानकारी धर्माध्यक्ष को दे दी थी और उनसे प्रार्थना की याचना की थी। उस समय अगस्तिन 32 वर्ष के थे। धर्माध्यक्ष आब्रोस की विद्वता एवं वक्तत्व कला का उन पर ऐसा गहरा प्रभाव पड़ा कि उनका पुनः ख्रीस्तीय धर्म शास्त्र की ओर गया। किन्तु उनकी आत्मा दुःखी थी, क्योंकि वे तक सत्य को नहीं पा सकें थे। ऐसी दशा में शांति पाने लिए वे बगीचे में जाकर टहलने लगे। सहसा उन्हें किसी बालक की आवाज़ सुनाई पड़ी -"उठाओ और पढ़ो, उठाओ और पढ़ो।" वे समझ गए कि ये शब्द उन्ही  है। वे तुरंत कमरे में गए। वहाँ मेज पर सुसमाचार की पुस्तक राखी हुई थी। उन्होंने उठा कर खोला तो उनकी दृष्टि संत पौलुस के इन शब्दों पर पड़ी- "हम अंधकार के कार्यों को त्यागकर ज्योति के शस्त्र धारण कर ले और दिन के योग्य आचरण करें। आप लोग ईसा मसीह को धारण करें और शरीर की वासनाएं तृप्त विचार छोड़ दे।" (रोमि 13:12-13) इन शब्दों ने अगस्तिन का हृदय परिवर्तन कर दिया। ईश्वर ने उनके ह्रदय को स्पर्श किया। अब उन्होंने सत्य को पूर्ण रूप से देख लिया और समझ लिया कि सच्चा आनंद पापों में नहीं, बल्कि ख्रीस्त का अनुसरण करने में ही है। तब उन्हें अपनी भूल का अनुभव हुआ। उन्होंने कुसंगति छोड़ दी और बीते पर पूर्ण रूप से पश्चाताप किया। वे अब पूर्णतया बदल गए थे और सम्पूर्ण हृदय से प्रभु येसु का शिष्य बनना चाहते थे। उन्होंने अनेक संतों की जीवनियाँ पढ़ी। उनके जीवन से वे अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने कहा-"यदि वे सब लोग संत बन सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं बन सकता?" उसी वर्ष पुनरुत्थान पर्व दिन धर्माध्यक्ष आब्रोस के हाथों से 32 वर्ष की आयु में उन्होंने बपतिस्मा संस्कार ग्रहण किया। उनके सब पाप दूर गए उनकी आत्मा ईश्वरीय  परिप्लावित हो गयी। उनके हृदय से ये उदगार स्वतः फूट पड़े - "हे प्रभु, तूने हमे अपनों के लिए बनाया है; और हमारे हृदय को तब तक शांति नहीं सकती जब तक वह तुझमें विश्राम नहीं पा लें।"

"बहुत देर से मैंने तुझे प्यार किया है, हे चिरंतन एवं नित्य नूतन सौंदर्य। तू मुझमें ही था और मेरे बाहर भी, जहाँ मैंने तुझे ढूँढा।"

अगस्तिन ने जब अपनी को बताया कि वे पुरोहित बनना चाहते हैं तो उनकी माँ अत्यंत प्रसन्न हुई। तब वे दोनों मिलकर टगास्ते के लिए रवाना हुए। किन्तु मार्ग में ओस्तिया पहुँचने पर उसकी माँ का देहांत हो गया। माँ के अंतिम संस्कार के बाद अगस्तिन टगास्ते चले आये। वहाँ पहुँच कर अगस्तिन एक नया जीवन -प्रेरितिक निर्धनता, प्रार्थना, तपस्या अध्ययन एवं गरीबों की सेवा-सहायता जीवन बिताने लगे। तीन वर्षों बाद वहाँ के विश्वासी समुदाय के आग्रहनुसार उनका पुरोहिताभिषेक हुआ। 42 वर्ष की आयु में वे हिप्पो के धर्माध्यक्ष नियुक्त हुए। अपने 30 वर्षों  धर्माध्यक्षीय कार्यकाल में उन्होंने अपने प्रभावशाली प्रवचनों तथा असंख्य लेखों द्वारा काथलिक धर्म विश्वास को सही रूप में एवं ढृढ़तापूर्वक लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए अनेक विधर्मी विरोधियों को पराजित किया।

साथ ही उन्होंने धर्म एवं जीवन के हर पहलू पर अनेकों ग्रंथो की रचना की। उनकी सभी कृतियाँ काथलिक जगत के लिए प्रकाश-स्तम्भ के सदृश्य है। वे इतने मानवीय थे कि उनसे आने वाली पीढ़ियाँ युगों तक मार्गदर्शन प्राप्त करती रहेंगी। उनकी दो पुस्तकें 'स्वीकारोक्ति' एवं 'ईश्वर का नगर' विश्व प्रसिद्ध है।

अगस्तिन ने अपने अनुयायिओं के लिए एक मठ की स्थापना की। उनके लिए उन्होंने एक नियमावली भी तैयार की जो संक्षिप्तता, विवेक एवं सद्भाव के कारण बहुत सम्मानित है। अगस्तीनियनों के अलावा अन्य अनेक धर्मसंघी भी उस नियमावली का पालन करते है। संत अगस्तिन कलीसिया के महान धर्मशास्त्रियों में एक थे। 

अंत में 28 अगस्त सन 430 ईस्वी में 76 वर्ष की आयु में हिप्पों में ही संत धर्माध्यक्ष अगस्तिन का देहांत हुआ। प्रति वर्ष 28 अगस्त को उनका पर्व मनाया जाता है।  वे धर्मशास्त्रियों के संरक्षक माने जाते है।

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