प्रेरित सन्त पौलुस

गैर यहूदियों के महान् प्रेरित एवं अदम्य साहस और अथक परिश्रम के साथ प्रभु के सुसमाचार का प्रचार करने वाले सन्त पौलुस को सन्त पेत्रुस के साथ ही कलीसिया का प्रमुख स्तम्भ माना जाता है। यद्यपि वे प्रारम्भ में कलीसिया के कट्टर शत्रु थे, फिर भी दमिश्क के मार्ग में प्रभु येसु ने उन्हें दर्शन देकर उनकी आत्मा की आँखें खोल दी। तब से उनके जीवन में आमूल परिवर्तन हुआ और वे ख्रीस्त विरोधी से ख्रीस्त के परम भक्त शिष्य बन गये। पौलुस का जन्म भूमध्य सागर के उत्तरी तट पर बसे हुए तारसुस नगर में एक सम्पन्न यहूदी परिवार में हुआ। तारसुस नगर उन दिनों रोमी साम्राज्य के अन्तर्गत सिलीसिया प्रान्त की राजधानी थी। यहूदी प्रथा के अनुसार, जन्म के आठवें दिन उनका खतना हुआ और उन्हें साऊल नाम दिया गया। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा अपने नगर तारसुस में हुई। बाद में उन्होंने येरूसालेम में यहूदी धर्म के प्रमुख रब्बी गमालिएल से संहिता की शिक्षा पायी। इस प्रकार वे यहूदी धर्म के गुरू बन गये।

 

प्रभु येसु की मृत्यु के पश्चात् साऊल येरूसालेम आये। उन दिनों प्रेरित पवित्रात्मा से परिपूर्ण होकर सारे यहूदिया में प्रभु येसु के सुसमाचार का प्रचार कर रहे थे। हजारों लोग उनसे बपतिस्मा लेकर ख्रीस्तीय धर्म में दीक्षित हो रहे थे। यद्यपि यहूदियों की महासभा उनके प्रचार- कार्य को रोकने का हर सम्भव प्रयास कर रही थी, फिर भी उनको कोई सफलता नहीं मिल रही थी। उन्होंने स्तेफन नामक उप याजक को बन्दी बनाया और पत्थरों से मार कर उसकी हत्या कर दी। युवक साऊल स्वयं वहाँ उपस्थित थे और वे इस हत्या का समर्थन करते थे। उस दिन से साऊल ने ख्रीस्तीय विश्वासियों का समूल विनाश करने का संकल्प कर लिया। इस कार्य के लिए उन्होंने यहूदियों की महासभा से आज्ञा- पत्र प्राप्त कर लिया और घर- घर जाकर नवीन पंथ के स्त्री- पुरुषों को घसीट कर बन्दीगृह में डाल दिया करते थे। एक दिन प्रधान याजक से आज्ञा- पत्र लेकर उन्होंने दमिश्क की ओर प्रस्थान किया ताकि वहाँ से वे इस नवीन पंथ के अनुयायियों को बन्दी बना कर येरूसालेम लाएँ। जब वे दमिश्क के निकट पहुँचे तो अचानक आकाश से एक तीव्र ज्योति उनके चारों ओर चमक उठी और उन्हें एक वाणी सुनायी दी, “साऊल, साऊल, तुम मुझ पर क्यों अत्याचार करते हो', उसने पूछा- “प्रभु आप कौन है?" उत्तर मिला- “मैं येसु हूँ जिस पर तुम अत्याचार करते हो। नगर में जाओ, तुम्हें जो करना है, वहाँ बताया जायेगा।” पौलुस उस ज्योति की तीव्रता से अन्धे हो गये। इसलिए उनके साथी हाथ पकड़ कर उन्हें दमिश्क ले चले। वह तीन दिनों तक अन्धे बने रहे और बिना खाये पिये प्रार्थना करते रहे। तीसरे दिन प्रभु ने अनानीयस नामक शिष्य को साऊल के पास भेजा। उन्होंने उनके सिर पर हाथ रखते हुए कहा- "भाई साऊल, प्रभु येसु ने मुझे भेजा है जिससे आपको दृष्टि प्राप्त हो और आप पवित्रात्मा से परिपूर्ण हो जाएँ।” साऊल फिर से देखने लगे। उन्होंने बपतिस्मा ग्रहण किया। साऊल कुछ समय तक दमिश्क के शिष्यों के साथ रहे और वहाँ बड़े जोश के साथ येसु के नाम का प्रचार करते रहे कि येसु ही प्रतिज्ञात मसीह हैं। यहूदियों के सभाघरों में धर्मग्रंथ के आधार पर वे यह प्रमाणित करते थे कि ख्रीस्त ही प्रतिज्ञात मसीह है। फलस्वरूप वहाँ के यहूदी उनसे घृणा करने लगे और उन्होंने पौलुस को समाप्त करने का षड़यन्त्र रचा। उनके शिष्यों को इसका पता लगा और उन्होंने चुपके से पौलुस को यहूदियों के चंगल से बचा लिया।

 

कुछ समय बाद पौलुस येरूसालेम पहुँचे और उन्होंन शिष्यों के समुदाय में शामिल होने की कोशिश की। किन्तु वे सब उनसे डरते थे; क्योंकि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि वे सचमुच येसु के शिष्य बन गये हैं। तब बरनाबस ने प्रेरितों को बताया कि प्रभु ने स्वयं पौलुस को किस प्रकार अपनाया है। बाद में पौलुस यूनानी भाषी यहूदियों के बीच प्रचार कार्य करने लगे। किन्तु वे भी उन्हें मार डालना चाहते थे। तब प्रेरितों ने उन्हें तारसुस भेजा। वहाँ भी भयंकर कष्ट झेलते हुए उन्होंने लोगों को प्रभु की वाणी सुनायी। तब बरनाबस उन्हें अन्ताखिया ले गये। वहाँ रह कर उन्होंने बहुत से लोगों को प्रभु येसु की शिक्षा दी। दूसरी बार जब वे येरूसालेम गये तब पवित्रात्मा ने प्रकट किया कि पौलुस और बरनाबस को उसने गैर - यहूदियों के बीच कार्य करने के लिए विशेष रूप से चुना है। तदनुसार पौलुस ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर भूमध्य सागर के उत्तरी इलाकों में अन्ताखिया, लिस्त्रा, एफेसुस, कलोस, थेसलनीका आदि अनेक स्थानों में विश्वासियों के समुदाय एवं कलीसिया की स्थापना की। इस कार्य के लिए उन्होंने दो बार लम्बी- लम्बी यात्राएँ की जिसमें उन्हें अनेकों कठिनाइयों तथा विरोधों का सामना करना पड़ा। उन्हें कई रातें जागते हुए बितानी पड़ी। भूख- प्यास, ठण्ड गर्मी, भोजन और कपड़ों का अभाव सब सहना पड़ा। यहूदियों द्वारा उन्हें पाँच बार एक कम चालीस कोड़े लगाये गये , तीन बार बेतों से पीटे और एक बार पत्थरों से मारे गये। लेकिन इन सब कठिनाइयों में प्रभु येसु स्वयं उनकी सांत्वना थे। वे सब कुछ अपने प्रभु के प्रेम से सहते रहे। उनके ये शब्द कितने हृदयस्पर्शी हैं "कौन हमको मसीह के प्रेम से वंचित कर सकता है? क्या विपत्ति या संकट ? क्या अत्याचार, भूख, नग्नता, जोखिम या तलवार?” (रोमि. 8: 35-39) इस प्रकार उनके अथक परिश्रम , लगन एवं निर्भयता का प्रेरणा स्रोत प्रभु येसु ख्रीस्त ही थे।

 

उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था क्रूसित ख्रीस्त के लिए कार्य करना। उसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए उन्होंने स्वयं को पूर्णतया समर्पित किया था। इसलिए किसी भी प्रकार की विपत्ति, थकावट अथवा परेशानियाँ उनके हृदय के जोश को कम न कर सकी। अतः उन्होंने कहा- “धिक्कार मुझे, यदि मैं सुसमाचार का प्रचार न करूँ।” (फिलि. 1:21) उन्होंने ख्रीस्त के साथ जो पूर्ण एकता प्राप्त की थी, उसे उन्होंने निम्न शब्दों में प्रकट किया है- “मैं मसीह के साथ क्रूस पर मर गया हूँ, मैं अब जीवित नहीं रहा, बल्कि मसीह मुझमें जीवित है।" (गलाति. 2:20) प्रभु येसु की संपूर्ण शिक्षा का संग्रह उनके चौदह पत्रों के रूप में हमें प्राप्त है। वह शताब्दियों से ईसाई धर्म शास्त्रियों को प्रभावित करते आ रहे हैं।

 

सन् 58 में पौलुस अन्तिम बार येरूसालेम गये। वहाँ के कुछ यहूदियों ने उन्हें पहचाना और बिना किसी कारण के सताने लगे। अन्त में रोमि सैनिकों ने बड़ी कठिनाई से उनके प्राणों की रक्षा की। वे उन्हें तत्कालीन राज्यपाल फेलिक्स और उसके बाद राजा अग्रिप्पा द्वितीय के समक्ष पेश किए। दो वर्षों तक कारावास में रहने के पश्चात् पुनः उन्हें रोमी सम्राट के समक्ष विचारार्था प्रस्तुत किया गया। अपने इस कारावास के जीवन में भी उन्होंने सुसमाचार का प्रचार नहीं छोड़ा। उन्होंने दरबारियों तथा स्वयं सम्राट को भी प्रभु की शिक्षा दी। सम्राट ने उन्हें निर्दोष मान कर कारावास से मुक्त किया। रोम में रहते हुए वहाँ काथलिक कलीसिया की नींव सुदृढ़ करने के लिए उन्होंने सन्त पेत्रुस को सहयोग दिया। किन्तु वे अधिक दिनों तक स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सके। निर्दयी सम्राट नीरो के शासनकाल में रोम में पुनः ख्रीस्त के अनुयायियों पर अत्याचार, चरम सीमा पर पहुँच गया और उन्हें मृत्युदण्ड देना प्रारम्भ हो गया। उन दिनों रोम नगर में भयंकर आग लगी और सारा शहर भस्म हो गया। सम्राट ने सारा दोष ख्रीस्तीयों पर मढ़ दिया। उसने कलीसिया के शीर्षस्थ मुखियों- सन्त पेत्रुस और सन्त पौलुस को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें मृत्युदण्ड का आदेश दिया। सन् 67 में जिस दिन सन्त पेत्रुस को क्रूस पर चढ़ाया गया उसी दिन पौलुस रोमी नागरिक होने के कारण तलवार से मारे गये । उन्होंने ईसाइयों का जो रक्त बहाया था, उसके बदले में अपना खून देकर कलीसिया को महिमान्वित किया। 29 जून को सन्त पेत्रुस के साथ उनका पर्व मनाया जाता है।

Add new comment

1 + 0 =

Please wait while the page is loading