लोगों के बीच संवाद की जरूरत

यूरोप में आप्रवासियों की समस्या तथा धूमिल पड़ते नैतिक एवं ख्रीस्तीय मूल्यों की पृष्ठभूमि में, सन्त पापा फ्राँसिस ने, लोगों के बीच सम्वाद की ज़रूरत को अनिवार्य बताया है।

वाटिकन सिटी, 12 अगस्त 2019 (रेई, वाटिकन रेडियो): यूरोप में आप्रवासियों की समस्या तथा धूमिल पड़ते नैतिक एवं ख्रीस्तीय मूल्यों की पृष्ठभूमि में, सन्त पापा फ्राँसिस ने, लोगों के बीच सम्वाद की ज़रूरत को अनिवार्य बताते हुए, कहा है कि विभिन्न राष्ट्रों एवं जातियों के लोगों की अस्मिता की सुरक्षा और सम्मान के लिये, परस्पर बातचीत की नितान्त आवश्यकता है। इटली के ला स्ताम्पा दैनिक समाचार पत्र को दी एक भेंटवार्ता में काथलिक कलीसिया के परमधर्मगुरु सन्त पापा फ्राँसिस ने कहा कि यूरोप एक अनमोल धरोहर है उसे पिघलना नहीं चाहिए अपितु दीवारों को उठाये बिना लोगों की पहचान का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजनीति को आज आप्रवासियों की समस्या से निपटने के लिये विवेक एवं रचनात्मकता की आवश्यकता है।

संप्रभुता और लोकलुभावनवाद का बहिष्कार
सन्त पापा फ्राँसिस ने कहा, "संवाद करने तथा अन्यों को सुनना से अपनी पहचान पाई जा सकती है। मानवीय एवं ख्रीस्तीय मूल्य संप्रभुता और लोकलुभावनवाद के विरुद्ध प्रतिपादक हैं जो "पुनरुद्धार की एक प्रक्रिया" को अन्जाम दे सकते हैं। संप्रभुता और लोकलुभावनवाद के रास्ते का परित्याग ही उचित है क्योंकि यह रास्ता युद्ध, संघर्ष और मनमुटाव की ओर ले जाता है।

सन्त पापा ने कहा, यूरोप का जन्म ख्रीस्तीय एवं मानवीय मूल्यों के आधार पर हुआ है जिसके लिये वार्ताओं की नितान्त आवश्यकता है। उन्होंने कहा, "यूरोपीय संघ में वार्ताओं की ज़रूरत है, परस्पर बातचीत की ज़रूरत है, एक दूसरे के ख्यालों को जानने की ज़रूरत है। इसके लिये", उन्होंने कहा, "यूरोप का प्रत्येक निवासी कहे, पहले यूरोप और फिर बाद में मैं।"
यूरोप अपनी अस्मिता बनाये रखे
सन्त पापा ने कहा कि यूरोप में फिर से मानवीय मूल्यों का सृजन केवल वार्ताओं के द्वारा हो सकता है जिसके साथ-साथ सुनना भी उतना ही अनिवार्य है। दुर्भाग्यवश, प्रायः हम एक व्यक्ति के लाप को सुना करते हैं जबकि यूरोप की स्थापना ख्रीस्तीय एवं मानवीय मूल्यों की नींव पर हुई है। सन्त पापा ने कहा, "अपनी अस्मिता को बनाये रखने के लिये दीवारें खड़ी करना ग़लत है क्योंकि अपने आप में बन्द होकर नहीं अपितु अन्यों के प्रति उदार होकर ही हम अपनी पहचान अथवा अस्मिता को समृद्ध बना पायेंगे। अस्मिता एक अनमोल कोष है, यह हर व्यक्ति और हर राष्ट्र की अपनी सांस्कृतिक, राष्ट्रीय, ऐतिहासिक एवं कलात्मक धरोहर है जो वार्ताओं और सम्वाद से पोषित और समृद्ध होती है।"

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