पुरोहितों, धर्मसंघियों, कलीसियाई सम्मेलन को संत पापा को संदेश

Pope Francis

मोरक्को की अपनी प्रेरितिक यात्रा के दूसरे दिन राबाट के संत पेत्रुस महागिरजाघर में पुरोहितों, घर्मसंघियों, धर्मबहनों और अंतर-कलीसियाई सम्मेलन के सदस्यों से मुलाकात की। संत पापा ने मुस्लिम समुदाय के बीच साम्प्रदायिकता का रास्ता अपनाते हुए प्रभु येसु के प्रेम के दृश्यमान बनाने हेतु प्रेरित किया।

संत पापा ने उनसे मिलने की खुशी जाहिर की, साथ ही फादर जरमेन और सिस्टर मेरी के साक्ष्य के लिए धन्यवाद दिया। संत पापा ने अंतर-कलीसियाई सम्मेलन के सदस्यों का भी धन्यवाद दिया जो आपस में मिलकर रहते हैं। मोरक्को में ख्रीस्तियों की संख्या बहुत कम है। संत पापा ने कहा, “जब हम संख्या की बात करते हैं तो मुझे येसु का वह प्रश्न याद आता हैः स्वर्ग का राज्य किसके समान है? यह उस खमीर के समान है जिसे एक महिला ने तीन पसेरी आटे में मिला दिया और सारा आटा खमीरा हो गया। (लूकस,13:18.21) यहाँ की कलीसिया उसी खमीर के समान है जो अपने प्रेम, सेवा और सहयोग द्वारा प्रभु के राज्य के विस्तार के लिए काम करती है।

कलीसिया का मिशन

संत पापा ने कहा कि पुरोहितों, धर्मसंघियों, धर्मबहनों या लोक धर्मियों के रुप में हमारा मिशन वास्तव में संख्या या उन स्थानों के आकार पर निर्धारित नहीं करता जिन पर हमारा आधिकार है, बल्कि दूसरों में परिवर्तन लाने और करुणा को जगाने की क्षमता पर निर्भर करता है। हमें येसु के शिष्यों के समान जीना है। हमें अपने पड़ोसियों के साथ, अपने दैनिक जीवन के सुख-दुःख, खुशियों और आशाओं को साझा करना है। (गौदियुम एतस्पेस,1) संत पापा ने कहा कि एक ख्रीस्तीय होने के नाते हमारे जीवन में समस्या तब आती है जब हम खुद को महत्वहीन बना देते हैं। उस नमक का क्या फायदा जो अपना स्वाद खो चुका हो। जब हम सुसमाचार के स्वाद को खो देते हैं तो स्वादहीन और बेकार हो जाते हैं। बुझा हुआ दीपक कोई लाभ का नहीं है। (मत्ती,5: 13-15)

संत पापा ने कहा कि हमारे जीवन का अर्थ "खमीर" है, जहाँ भी और जिस किसी के साथ भी हम खुद को पाते हैं, भले ही यह कोई मूर्त या तात्कालिक लाभ न दिखाई दे, वहाँ हम अपनी उपस्थिति की छाप छोड़ते हैं। (एवांजली गौदियुम, 210)  हम आपस में मेल प्रेम से रहें, एक दूसरे को क्षमा दें, तो हमें ईश्वर के राज्य को प्रचार करने की जरुरत न होगी और दूसरों को खुद के बारे बताने की जरुरत न होगी क्योंकि “यदि तुम एक दूसरे को प्यार करोगे, तो उसी से सब लोग यह जान जायेंगे कि तुम मेरे शिष्य हो।” (योहन 13:35)

संत पापा ने कहा कि इस परिवेश में यहाँ की स्थानीय कलीसिया का उद्देश्य अपनी संख्या बढ़ाना नहीं, अपितु कलीसिया को अपने प्रभु मसीह के साथ निष्ठा से संवाद में प्रवेश करना है, जो एक मित्र के रूप में संवाद में प्रवेश करने की इच्छा रखते हैं और हमें उनसे दोस्ती करने के लिए कहते हैं (सीएफ देई वर्बुम, 2)। येसु मसीह के शिष्यों के रूप में, हमारे बपतिस्मा के दिन से ही हम मुक्ति और मित्रता के इस संवाद का एक हिस्सा बनने के लिए बुलाये गये हैं और इससे हम सबसे पहले लाभान्वित होते हैं।

संवाद के जीवित संस्कार

संत पापा ने कहा कि इस घरती पर यहाँ के ख्रीस्तीय संवाद के जीवित संस्कार हैं। वे सभी अपने गुरु येसु, जो स्वभाव से नम्र और विनीत हैं, उनके पद चिन्हों पर चलने के बनने के लिए बुलाये गये हैं।(सीएफ,मत्ती11:29)  संत पापा ने संत फ्राँसिस असीसी को याद किया जिसने बड़े साहस के साथ सुल्तान अल-मलिक अल-कमिल के साथ मुलाकात कर संवाद किया था। धन्य चार्ल्स डी फौकॉल्ट, जो नाजरेत में येसु के विनम्र और छिपे हुए जीवन से बहुत प्रभावित हुए, उन्होंने चुपचाप स्वीकार किया, कि वह "सभी के लिए भाई" बनना चाहते थे। संत पापा ने कहा कि जब कलीसिया अपने मिशन के प्रति निष्ठावान रहते हुए दुनिया के साथ वार्तालाप में प्रवेश करती है तो उन्हें ईश्वर का संदेश देती है।

मुक्ति के संवाद के मध्यस्थ

संत पापा ने ख्रीस्तियों की प्रशंसा की कि वे मोरक्को में येसु मसीह के अनुयायियों के रूप में दैनिक संवाद, सहयोग और दोस्ती के माध्यम से आशा का भविष्य बोने का तरीका अपनाया है,जिससे कि भय और नफरत, मतभेदों और अज्ञानता को खत्म किया जा सके। क्योंकि हम जानते हैं कि भय और घृणा, शोषण और हेरफेर, हमारे समुदायों को अस्थिर करते हैं और उन्हें आध्यात्मिक रूप से निसहाय बना देते हैं।

संत पापा ने सभी को मुस्लिम समुदाय के बीच साम्प्रदायिकता का रास्ता अपनाते हुए प्रभु येसु के प्रेम के दृश्यमान बनाने हेतु प्रेरित किया। संत पापा ने उन बुजुर्ग धर्मसंघियों, धर्मबहनों को भी याद किया जो यहाँ आने में असमर्थ थे। संत पापा ने उनकी सेवा के लिए पुनः धन्यवाद दिया।

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