तो बस शुरुआत करो

टीनएज हमारी उम्र का एक ऐसा पड़ाव होता है जहाँ हमको खुद नहीं पता होता है कि हमें क्या चाहिए? इस समय में कई प्रकार से मानसिक भावनात्मक एवं शारीरिक रूप से होने वाले परिवर्तन हमारे मन में एक प्रकार की उलझन पैदा कर देते है।

कहते है- "जहां कोई उलझन नहीं है, वहाँ कोई टीनएज नहीं है।" एक टीनएजर  होने के नाते मैं इस पंक्ति का अर्थ स्पष्ट रूप से समझ सकती हूं। वास्तव में, मैं स्पष्ट रूप से इसे परिभाषित भी कर सकती हूं, और निश्चित रूप से सभी प्रकार के उलझनों का अनुभव कर सकती हूं, जो मेरी उम्र के लोगों पर गुजरती हैं। यदि आप एक टीनएजर हैं, तो आपका दिमाग निश्चित रूप से प्रश्न पूछेगा, जैसे कि मेरी उम्र के आकर्षण का, बदलाव का, पढाई करने के लिए; मोहब्बत वगैरह के बारे में। इस उम्र में संघर्षों की इस दुनिया से बाहर आना मुश्किल होता है।

जहां तक मुझे पता है कि हमारे लिए हमारी सभी समस्याओं का हल या सबसे अच्छा समाधान हमारे माता-पिता के साथ बातचीत करना है। मानो या न मानो वे आपके तथाकथित दोस्तों से बहुत बेहतर हैं। शायद आपको यह बात थोड़ी अजीब लगेगी। आपके पास बहुत सारी चीज़े हो सकती है जिसे आप अपने माता-पिता के साथ साझा करने के बारे में सोच भी नहीं सकते है। वास्तव में अगर देखा जाए तो आपको अपने माँ-पिता से सब कुछ साझा करने की आवश्यकता नहीं है। आपको ज्यादा कुछ नहीं करना है। बस आप दिन भर स्कूल में, या कॉलेज में, या कोचिंग में, या दोस्तों के साथ जो कुछ भी करते है, उन चीज़ो में से आप के दिन की किसी एक विशेष घटना को, जिसके बारे में आप पर्याप्त रूप से आश्वस्त हैं; कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह घटना कितनी ही छोटी ही क्यों ना हो, अपने माता-पिता में से किसी एक के साथ साझा करें। और यह कार्य रोज़ाना करें। आपको यह कार्य प्रारम्भ करने में थोड़ी सा अजीब लगेगा। लेकिन जब आप इसे प्रारम्भ कर देंगे और अपने प्रतिदिन की घटना आप -पिता के साथ साझा करेंगे तो, आप धीरे-धीरे महसूस करना शुरू कर देंगे कि आपके दृष्टिकोण, आपके विचार और आपकी सभी घटनाएं, अब खुद ब खुदआपके मुंह से निकलती हैं। उस अवस्था में आप सतर्क हो जाते हैं- अब जब आपका मुंह आपकी अनुमति के बिना भी बोलना शुरू कर देता है। जब भी आप कुछ करते हैं तो भी गलत होता है। इसके अलावा, यह आपके संचार कौशल को भी बढ़ाएगा, आपके आत्मविश्वास के स्तर को बढ़ाएगा और यहां तक कि आपके द्वारा बोले जाने वाले हर विषय के बारे में समझ बनाने में भी मदद करेगा।

कुछ साल पहले मैं भी अपनी माँ से खुल कर बात करने में झिझकती थी। मुझे नहीं पता कि मैंने वास्तव में यह प्रयोग कब शुरू किया था। लेकिन अब यह बात मेरे लिए साधारण बात बन गयी गई। अब यह मेरी एक आदत बन गयी है। मेरी माँ को यह पता नहीं है कि मेरा वर्तमान व्यवहार, दूसरों के साथ बातचीत करने का तरीका, हर लेख जो मैं लिखती हूँ और जो नहीं - जो कुछ भी मैं करती हूँ उसमें मेरी माँ के शब्दों और कार्यों का प्रतिबिंब होता है। मेरा मानना है कि यदि आप भी इस प्रयोग को शुरू करते हैं तोआपको आपके कई सवालों और भ्रमों के स्पष्ट उत्तर मिलेंगे।

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