टिप

"जीना है तो रिश्तो में जियो, रिश्तो के बिना मानवीय जीवन व्यर्थ है। "

एक साधारण व्यक्ति अपना पूरा जीवन धन अर्जित करने में लगा देता है। वह हर वस्तु को प्राप्त करने की आशा करता है। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है की उसके पास सुख सुविधाओं की सारी चीजे उपलब्ध हो। मानव स्वभाव ही इस तरह का है की वह हर चीज़ को हासिल करना चाहता है। वह किसी से कुछ लेने में ज्यादा नहीं सोचता, मगर जब बात कुछ देने की या किसी की मदद करने की आती है तो वह इस बारे में हज़ार बार सोचता है। मनुष्य अपने स्वार्थ के कारण ही अपने सभी रिश्ते खो देता है। हमारे पास जो कुछ भी हो हमे उसी से लोगो की मदद करनी चाहिए और अन्य लोगो को खुश रखने का प्रयत्न करना चाहिए।

एक बार एक 8 साल की छोटी सी लड़की एक दूकान पर आइसक्रीम खाने जाती है।
तभी वेटर उसके पास आकर पूछता है:-  क्या चाहिए?
लड़की:-  ये आइसक्रीम कितने की है भैया?
वेटर :- 15 /- रूपये की।
लड़की ने अपना पॉकेट चेक किया फिर उसने छोटी वाली आइसक्रीम का दाम पूछा तो वेटर ने ग़ुस्से से कहा:- 12/- रुपये की है।
लड़की ने कहा छोटी वाली दे दीजिये। वेटर उसे छोटी वाली आइसक्रीम दे देता है।
लड़की उसे आइसक्रीम के पैसे दे देती है और आइसक्रीम खाकर चली जाती है ।
जब वेटर खाली प्लेट लेने जाता है तो उसकी आँखों ने आंसू आ जाते है, क्योंकि उस लड़की ने उसके लिए टिप के रूप में 3/- रूपये छोड़ दिए थे।

यह छोटी सी कहानी हमे यह सिखाती है की आपके पास जो कुछ भी है, उसी से हमे दुसरो को खुश करने की कोशिश करनी चाहिए।

हम हर पल यह सोचते है की हमारे पास तो ज्यादा कुछ नहीं है तो हम लोगो की मदद कैसे करे? जब भी संभव हो हमे लोगो की मदद करनी चाहिए। अगर कोई हमसे कुछ मांगे तो हमे उसे दे देना चाहिए। और हमे हर बात में ईश्वर का शुक्रिया अदा करना चाहिए क्योंकि ईश्वर ने हमे माँगने वालो में नहीं बल्कि देने वालो में रखा है। क्या हम इतने भी योग्य नहीं की हम किसी को कुछ भी न दे सके ?

ज्यादा न सही थोड़ा तो दे ही सकते है। हमारे संत पिता फ्रांसिस हमसे आह्वान करते है की हमारे पास जो भी हो, उससे हमे कलीसिया की मदद करनी चाहिए। हमे हमारे बच्चो को भी ये सिखाना चाहिए की, यदि हमारे पास थोड़ा भी है तो उस थोड़े में से ही हमे ज़रूरतमंद की मदद करनी चाहिए। हमे दान देने की प्रवृत्ति हमारे अंदर विकसित करनी होगी। और जितना बन सके उतना दान दे, चाहे वो थोड़ा सा ही क्यों न हो। धर्मग्रन्थ में हम पढ़ते है की येशु उस कंगाल विधवा के दो अधेले की तारीफ करते है, क्योंकि कंगाल विधवा ने तंगी में रहते हुए भी जीविका के लिए अपने पास जो कुछ था, वह सब दे डाला।

आज के इस दौर में हम सबकुछ तो नहीं दे सकते, लेकिन कुछ तो दे ही सकते है। और इस देने के इस भाव को हमे अपने आचरण में लाना होगा। हमे देखकर ही हमारे बच्चे हम से सीखेंगे। जीवन का असली मकसद सिर्फ धन अर्जित करना नहीं, बल्कि जीवन जीना है। और हम अकेले अपना जीवन नहीं जी सकते। हम परिवार एवं समाज में रहकर ही जीवन का असली आनंद ले सकते है। अपने स्वार्थ को दरकिनार करके हमे लोगो की मदद करनी चाहिए और उन्हें खुश रखने की कोशिश करनी चाहिए। तभी हम सही मायनो में जीवन का आनंद ले पाएंगे।

प्रवीण परमार

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