वर्षा जल संचयन से करे पानी की खेती

Rain Water Harvesting System

आज पानी कि कमी हम सभी के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है | हम आज देख रहे हैं कि गर्मियों के मौसम में पानी की कमी से लोगो को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है | चाहे वह ग्रामीण क्षेत्र हो या शहरी क्षेत्र पानी कि कमी सभी दूर बरकरार है | पनिएक मात्र ऐसा तत्व है जिसे हम पैदा तो नही क्र सकते , लेकिन इसे बचाने के लिए कुछ ऐसे उपाय क्र सकते हैं , जिससे बढते जल संकट से हमारी आने वाली पीढ़ी को नही जूझना पड़े | आज कि वार्ता में हम इसी विषय पर चर्चा करेंगे कि हम किस तरह से अपने आसपास स्थानों पर जल संचय क्र पानी कि कमी को दूर कर सकते हैं | धरती के गर्भ को फिर से पानी से भर सकते हैं |

पानी को जमीन में से सींचने का सबसे आसान और महत्वपूर्ण तरीका है रेन वाटर हार्वेस्टिंग | बरसात के पानी को किसी ख़ास माध्यम से जमा करना या इकट्ठा करना वाटर हार्वेस्टिंग कहलाता है | पृथ्वी का जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है | दुनियाभर में पेयजल संकट एक गंभीर चुनौती से रूप में सामने आ रहा है | पशुओ के पीने के पानी कि उपलब्धता , फसलो कि सिचाई के साथ ही पेयजल के सूखते स्त्रोत आज चिंता का बड़ा कारण है | ऐसे में समस्या के विकल्प के रूप में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अपनाया जा रहा है |

वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम में घरो कि छतों , स्थानीय संस्थाओ कि छतो या फिर विशेष रूप से बनाए गए क्षेत्र से इकट्ठा किया जाता है | इसमें दो तरह के गड्ढे बनाए जाते हैं | एक जिसमे दैनिक इस्तेमाल के लिए पानी इकट्ठा किया जाता है और दुसरे का सिंचाई के काम में | दैनिक इस्तेमाल के लिए पक्के गड्ढे को सीमेंट व ईट से बनाया जाता है | इसकी गहराई 7 से 10 फीट व लम्बाई 4 फीट होती है | इन गड्ढों को पाइप द्वारा छात की नालियों और टोटियों से जोड़ दिया जाता है , ताकि बारिश कपानी सिधे इन गड्ढों में जा सके , जबकि दुसरे गड्ढे को यूं ही रखा जाता है | इससे खेतो कि सिचाई की जाती है | घरो की छत से जमा किए गए पानी कि तुरंत ही इस्तेमाल में लाया जा सकता है |

विदेशों में तो कुछ देख ऐसे हैं , जहाँ पानी की कमीं को इस तरह की योजना से पूरा किया गया है | न्यूजीलैंड में कुछ ऐसे इलाके हैं , जहाँ लोग वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम पर ही निर्भय हैं | यहाँ के लोग बारिश होने पर अपने घरो के छत से पानी इकट्ठा करते हैं | ऐसे ही राजस्थान के थार इलाके में लोग वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से पानी इकट्ठा करते हैं | वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम उन स्थानों के लिए उचित है , जहाँ प्रतिवर्ष न्यूनतम 200 मिमी बारिश होती है | वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का खर्च 400 नया घर बनाते समय करीब 1500 रुपये तक आता है , लेकिन इस पद्धति से आजीवन कई तरह के फायदे हैं |

अब यह तो आप जान गए हैं कि वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम कितना जरूरी और कारगर है | इसका उपयोग कैसे करते हैं आइये आपको इसकी जानकारी भी दे दें | 

पानी को इकट्ठा करने के लिए घर कि छतों ,स्थानीय कार्यालयों कि छतो या फिर विशेष रूप से बनाए गए क्षेत्र से बारिश का पानी एकत्रित किया जाता है | इसमें दो तरह के गड्ढे बनाए जाते हैं | एक गड्ढा जिसमे दैनिक प्रयोग के लिए पानी इकट्ठा किया जाता है और दुसरे गड्ढे का पानी सिचाई के काम में प्रयोग किया जाता है | रोजाना प्रयोग के लिए पक्के गड्ढे समय प्रयोग में लाया जा सकता है | यहाँ वर्षा जल संचयन के लिए इस तरह की तकनीक को अपनाया जाता है जिससे कि यह ज्यादा जगह न घेरे | शहरी क्षत्रों में छत से प्राप्त वर्षा जल भंडारण करने कि कुछ तकनीके पुनर्भरण पिट , पुनर्भरण खाई , नलकूप और पुनर्भरण कूप जैसी तकनीके हैं |

भारत में मित जलीय क्षत्रों ,जैसे राजस्थान के थार रेगिस्तान क्षत्र में लोग जल संचयन से जल एकत्रित करते हैं | यहाँ छत-उपरि जल सचायण तकनीक अपनायी गयी हैं | छतो पर वर्षा जल संचयन करना सरक एवं सस्ती तकनीक है जो मरुस्थलो में हजारो सालो से चलायी जा रही है | पिछले दो ढाई दशको से बेयरफुट कॉलेज पंद्रह –सोलह राज्यों के गावों और अंचलो के पाठशालाओं में , विद्यालय कि छतों पर इकट्ठा हुए वर्षा जल को , भूमिगत टैंको में संचित करके 6 करोड़ से अधिक लोगो कोपेय्जल उपलब्ध करता आया है | यह कॉलेज इस तकनीक को मात्र वैकल्पिक ही नही बल्कि स्थायी समाधान के रूप में विस्तार क्र रहा है | आपको यह जानकार ख़ुशी होगी कि कई ऐसे इलाके हैं जहाँ आज से दस साल पहले तक पानी कि भारी कमी होती थी , वहां आज इस तरह कि छोटी तकनीको को अपनाकर ग्रामीणों ने अपने इलाको कोजल से संपन्न बना दिया है | ऐसे ही मद्यप्रदेश के देवास जिले के एक गाव गोरवा का जिक्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन कि बात में भी किया था | यह जमींन में पानी का भारी कमी होती थी , लेकिन बाद में ग्रामीणों ने गाव में अपने खेतो में छोटे-छोटे तालाब बनाकर इस कमी को पाट किया है | अब गोरवा गाव में किसान पूरी तरह से संपन्न हो राहे हैं | किसानो के संकल्प ने आसपास के गावो के दुसरे किसानो को भी इस काम के लिए प्रेरित किया है | इसी तरह इंदौर जिले में लगातार कम होती जल कि आपूर्ति को देखते हुए गर्मी में मौसम में जिला प्रशासन ने तालाब में पुर्न गहरीकरण का आभियान चलाया | वही शहरी क्षत्रों में लोगो को वाटर कोसमेंट और ईट से निर्माण करते हैं और इसकी गहराई सात से दस फीट व लम्बाई और चोड़ाई लगभग चार फीट होती है | इन गड्ढो को नालियों और पाईप और टोटियों से जोड़ दिया जाता है , जिससे वर्षा का जल सीधे इस गड्ढो में पहुँच सके | वही दुसरे गड्ढे को ऐसे ही कच्चा रखा जाता है | इसके जल से खेतो कि सिचाई कि जाती है | घरो कि छत से जमा किए गए पानी को तुरंत ही प्रयोग में लाया जा सकता है | विश्व में कुछ ऐसे इलाके हैं जहाँ लोग जल संचयन प्रणाली पर ही निर्भय रहते हैं | वहां पर लोग वर्षा होने पर अपने घरो के छत में पानी एकत्रित करते हैं और बाद में उसका उपयोग करते हैं |

आपको यह तो पता चलही गया है कि किस तरह से वर्षा के जल को आपको इकट्ठा करना है | ऐसे में वर्षा जल संचयन के तरीको को भी आपको अपनाना चाहिए |

शहरी क्षेत्रों में वर्षा के जल को संचित करने के लिए बहुत सी संच्नाओ का प्रयोग किया जा सकता है | ग्रामीण क्षेत्र में वर्षा जल का संचयन वाटर शेड को एक इकाई केरूप लेकर करते हैं | यहाँ आमतौर पर सतही फैलाव तकनीक अपनाई जाती है , क्योकि ईएसआई प्रणाली के लिए जगह प्रचुरिता में उपलब्ध होती है , तथा पुनर्भरित जल कि मात्रा भी अधिक होती है | ढलान , नदियों और नालो के माध्यम से व्यर्थ जा रहे जल को बचाने के लिए इन तकनीको को अपनाया जा सकता है | गली प्लग , परिरेखा बाँध ( कंटूर बंड ), गोबियन संरचना , पारकोलेशन टैंक , चौक बांध  सीमेंट प्लग नाला बंड , पुनर्भरण शाफ़्ट , कूप डग वैल पुनर्भरण , उप सतही डाईक , आदि संरचनाए ग्रामीण क्षत्रों में कारगर होती है | ग्रामीण क्षत्रों मे छत से प्राप्त वर्षाजल से उत्पन्न अप्रवाह संचित करने के लिए भी बहुत सी संरचनाओ का प्रयोग लिया जा सकता है | शहरी क्षत्रों में इमारतों कि छत ,पक्के व कच्चे क्षत्रों में मिलने वाला बरिश का पानी यूं ही बह जाता है | यह पानी सोखने वाले गड्ढो में पुनर्भारित किया जा सकता है और जरूरत के हार्वेस्टिंग सिस्टम  लगाने के लिए प्रेरित किया | इन्ही प्रयासों की बदौलत अब धीरे-धीरे इंदौर जिला जल आपूर्ति के क्षेत्र में आतम निर्भर बन रहा है | हम सभी भी कुछ ऐसा ही क्र सकते है | जरूरत है तो एक संकल्प की| एक इच्छा शक्ति की और सकारात्मक सोच की | हम पानी को बना तो नही सकते , लेकिन कुछ तकनीको को अपनाकर इसे बचाने और बढ़ाने में योगदान जरुर दे सकते हैं |

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