आगमन काल

मनन चिंतन : योहन को ‘साक्ष्य’ शब्द से संबन्धित किया जा सकता हैं। उनके जीवन का मतलब ही था येसु का साक्षी बनना। उसी प्रकार ख्रीस्तीय होने के नाते हमसे आशा की जाती है:-

आगमन काल का चौथा रविवार

पहला पाठ :- इसायाह 52:7-10
दूसरा पाठ :- इब्रानीयों 1:1-6
सुसमाचार :- योहन 1:1-18

मनन चिंतन : योहन को ‘साक्ष्य’ शब्द से संबन्धित किया जा सकता हैं। उनके जीवन का मतलब ही था येसु का साक्षी बनना। उसी प्रकार ख्रीस्तीय होने के नाते हमसे आशा की जाती है:-

भागीदारी और साक्षी:- ख्रीस्तीय होने के नाते येसु के मुक्तिप्रद कार्य में सहभागी होने के लिए हम बुलाए गये है। संत पापा फ्रांसिस कहते हैं – “जब एक माँ येसु की साक्षी बनती है तब कालीसिया फलदायक है” जब तक हम येसु के साथ गहरा संबंध बना कर उनके कार्यों में सहभागी नहीं होते है, ख्रीस्तीय जीवन फीका, नपुंसक है। योहन बपतिस्ता और अपने सभी नए शिष्यों के साथ येसु ने संबंध जोड़कर उन्हें अपने कार्यों का सहभागी बनाकर शांति, न्याय और दयालुता के संदेश को स्थापित किया। दुबारा संत पापा फ्रांसिस कहते हैं – “हमलोग देवताओं पर विश्वास संबन्धित दार्शनिक विचारधारा, कर्मकाण्ड, शुद्ध ईशशास्त्र और सुंदर चीजों से आशाएँ नहीं करते। हमलोग वे लोग हैं जो येसु का अनुसरण करते और उनका साक्ष्य देते हैं।”

उनका अंग बनना:- येसु के संदेश को फैलाने की इच्छा रखने का तात्पर्य है येसु को पाने की इच्छा रखना। यूख्रिस्थीय समारोह, प्रार्थना एवं बाइबिल पाठन ये सभी ये सभी हमारे जीवन में येसु के संदेश को गहरा बनाने/करने का रास्ता है। क्या हम कह सकते हैं कि ये विश्वास के दो पहलू हमेशा हमारे जीवन के अंग होंगे। तब ही हम येसु ख्रीस्त का शरीर के अंग बन सकते हैं।

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