दुःखों में ईश्वीरय प्रेम की जड़ें हैं।

आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा
आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह में मानव जीवन के दुःखों को ईश्वरीय प्रेम की जड़े से संयुक्त किया।

वाटिकन रेडियो, 13 फरवरी 2020 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए तीर्थयात्रियों और विश्वासियों को, संत पापा पौल षष्ठम् के सभागार में अपनी धर्मशिक्षा माला देने के पूर्व संबोधित करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।

हमने येसु ख्रीस्त के धन्य वचनों पर अपनी यात्रा शुरू की है और आज हम दूसरे धन्य वचन पर चिंतन करेंगे- “धन्य हैं वे जो शोक करते हैं उन्हें सांत्वना मिलेगी”।

ख्रीस्तीय आध्यात्मिकता का केन्द्र

ग्रीक भाषा जिसमें सुसमाचार लिखी गई है इस धन्य वचन की अभिव्यक्ति उस क्रिया में करती जो अपने में निष्क्रिय नहीं बल्कि सक्रिया है, वास्तव में, धन्य हैं वे जो दुःख से पीड़ित हैं जो दुःख के कारण अपने हृदय की गरहाई में विलाप करते हैं। यह वह मनोभाव है जो ख्रीस्तीय आध्यात्मिकता का केन्द्र-बिन्दु बनता है। प्रथम सदी के मठवासी धर्माचार्यों ने इसे “पेनथोस” की संज्ञा दी अर्थात एक आंतरिक पीड़ा जो हमें खोलती है जिसके फलस्वरुप हम ईश्वर और अपने पडोसी के संग एक संबंध में प्रवेश करते हैं। यह ईश्वर और अपने पड़ोसियों के साथ एक नये संबंध की स्थापना करने हेतु हमारी मदद करता है।

पीड़ा के दो रुप

धर्मग्रंथ में हम इस पीड़ा को दो रूपों को पाते हैं- पहला मृत्यु के कारण या किसी के दुःख होने के कारण। वहीं आँसू आने के कारण स्वयं के पाप हैं- जब हृदय ईश्वर और अपने पड़ोसी के प्रति किये गये अपराधों के कारण घायल होकर रोता है।

अतः हमें दूसरे को इस भांति प्रेम करना है जो उसे हमसे संयुक्त करता और वह अपने दर्द को हमसे साझा करने हेतु बाध्य होता हो। कुछ लोग हैं जो दूर रहते हैं, अपने में एक कदम पीछे हटते हैं; इसके बजाय यह महत्वपूर्ण है कि दूसरे हमारे दिल में एक जगह बनायें।

आँसू एक उपहार

संत पापा ने कहा कि मैंने कितनी बार आँसू को एक उपहार के रुप में व्यक्त किया है और यह कितना मूल्यवान है। क्या हम ठंढ़ा रहते हुए प्रेम कर सकते हैंॽ क्या हम कार्यों या कर्तव्य से प्रेम कर सकते हैंॽ निश्चित ही नहीं। बहुत से दुखित लोग हैं जिन्हें सांत्वना की जरुरत है लेकिन कई बार दुःख के कारण हमें संरक्षण मिलता है, हम सचेत होते हैं, तो वहीं दूसरे हैं जो अपने हृदय को पत्थर बना लेते और रोना भी भूल जाते हैं। हमें उन लोगों को जगाने की जरुरत है जो दूसरों के दुःखों को देखकर द्रवित नहीं होते हैं।

उन्होंने कहा कि उदहारण के लिए विलाप करना अपने में में कड़वा मार्ग है लेकिन यह जीवन और अति महत्वपूर्ण मूल्य के संबंध में हमारी आंखों को खोलने में हमारी मदद कर सकता है, ऐसी परिस्थिति में हम यह एहसास करते हैं कि समय कितना छोटा है।

पश्चताप के आंसू

इस धन्य वचन का एक दूसरा विरोधाभाषी अर्थ है- अपने पापों के लिए रोना।

यहाँ हमें इस बात को स्पष्ट करने की जरुरत है- बहुत से लोग हैं जो अपने में क्रोधित होते क्योंकि उन्होंने एक गलती की है। लेकिन यह घंमड है। वहीं दूसरे लोग जो अपनी गलतियों के कारण, अच्छे कार्य नहीं करने, ईश्वर से अपना संबंध विछेद होने के कारण रोते हैं। यह प्रेम नहीं कर पाने हेतु आंसू बहाना है जो दूसरे के लिए अपने दिल में एक जगह होने की बात बयाँ करता है। यहां हम इसलिए रोते हैं क्योंकि हम ईश्वर के प्रति अपने को वफादार नहीं रख पाये जो हमें अत्याधिक प्रेम करते हैं। हम इसलिए दुःखित होते हैं क्योंकि हमने अच्छे कार्यों को नहीं किया है जो हममें पाप की अनुभूति लाती है। कुछ लोग कहते हैं, “मैंने अपने प्रेम करने वाले को चोट पहुँचाया है” यह उनमें दर्द और आँसू लेकर आता है। यदि ऐसे आंसू हमारे जीवन में आते हैं तो ईश्वर की महिमा हो।

पेत्रुस के आँसू का अर्थ

यह हमारे गलतियों की विषयवस्तु है जो कठिन लेकिन महत्वपूर्ण है। हम संत पेत्रुस के रोने के बारे में चिंतन करें जो उन्हें नया और एक सच्चे प्रेमी स्वरुप परिणत कर देता है, आँसू बहाना उसे शुद्ध और ऩया बना देता है। पेत्रुस येसु को देखकर रोते हैं। इसके विपरीत यूदस, बेचारा अपनी गलती को स्वीकार नहीं करने के कारण खुदकुशी कर लेता है। पाप को हम ईश्वर के उपहार स्वरूप समझ सकते हैं जहाँ पवित्र आत्मा कार्य करते हैं। हम अपने से पाप को नहीं समझ सकते हैं। यह हमारे लिए कृपा है जिसके लिए हमें प्रार्थना करने की जरुरत है। हे प्रभु हमें कृपा दे जिससे हम अपने किये गये बुराई को समझ सकें। इस कृपा की प्राप्ति के उपरांत हम अपने में पश्चताप के आँसू बहाते हैं।

आँसू से धुला चेहरा अवर्णनीय

संत पापा ने कहा कि प्राचीन काल के मठवासियों में से एक सीरिया के एफ्रेम कहते हैं कि आँसू से धुला चेहरा अपने में अवर्णनीय सुन्दर है। हम उसमें पश्चताप, आँसूओं और क्षमा की सुन्दरता को देख सकते हैं। ख्रीस्तीय जीवन को हम सदा करूणा में सर्वोतम पाते हैं। वह अपने में विवेकी और धन्य है जो प्रेम में दर्द को स्वीकार करता है क्योंकि वह पवित्र आत्मा के द्वारा सांत्वना प्राप्त करेगा जो ईश्वर की कोमलता की निशानी हैं जो हमें क्षमा करते और हममें सुधार लाते हैं। ईश्वर सदैव हमें क्षमा करते हैं, हम इस बात को कभी न भूलें। वे हमारे पापों को चाहे वे कितने भी कुरूप क्यों न हों, हमेशा क्षमा करते हैं। कठिनाई हमारे साथ यह है कि हम क्षमा मांगते थंक जाते हैं। हम अपने में बंद हो जाते और क्षमा की याचना नहीं करते हैं। हमारी कठिनाई यही है लेकिन वे हमें क्षमा करने तैयार हैं।

यदि हम इस बात को याद रखें कि, “ईश्वर हमारे पापों के अनुसार व्यवहार नहीं करते और न हमारे पापों के अनुसार हमें दण्ड देते हैं” (स्तो.103.10 ) तो हम दया और करुणा में निवास करते और हममें प्रेम प्रकट होता है। प्रभु हमें बहुतायत में प्रेम प्रदान करें, जिससे हम मुस्कान में प्रेम कर सकें, घनिष्टता में दूसरों के निकट रहें और आँसू में भी सेवा कर सकें।

इतना कहने के बाद संत पापा फ्रांसिस ने अपनी धर्मशिक्षा समाप्त की औऱ सभों के संग हे पिता हमारे प्रार्थना का पाठ करते हुए सभों को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया।

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